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पार्वती के सामने शिवजी ने क्यों लिया था मगरमच्छ का रूप?
भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने कठोर तपस्या की थी। उन्होंने तरह तरह के दुःख और कष्ट झेले थे तब जाकर महादेव ने उनकी प्रार्थना सुनी थी और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था।
लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि देवी पार्वती के साथ विवाह करने से पूर्व भोलेनाथ ने उनकी परीक्षा ली थी। आइए जानते हैं शिव जी ने कब और कैसे माता पार्वती को परखने के लिए उनकी परीक्षा ली थी।

भोलेनाथ के अलावा कोई न स्वीकार था माता पार्वती को
देवी सती जो महादेव की पहली पत्नी थी। उन्होंने ही माता पार्वती के रूप में अपना दूसरा जन्म लिया था। कहते हैं बचपन से ही पार्वती जी ने मन ही मन भगवान शिव को अपना पति मान लिया था इसलिए घरवालों के लाख समझाने के बाद भी वे अपने फैसले पर अटल रहीं।
महादेव से विवाह करने के लिए घने जंगलों में हज़ारों वर्षों तक कठिन तपस्या करती रहीं जिसे देखकर समस्त देवी देवता भी आश्चर्यचकित रह गए थे।
सभी देवताओं ने मिलकर भोलेनाथ को माता पार्वती की मनोकामना पूर्ण करने के लिए कहा किन्तु शंकर जी ने यह तय कर लिया था कि जब तक वे अपनी भावी पत्नी को अच्छी तरह से परख नहीं लेंगे वे उनसे विवाह नहीं करेंगे।

मगरमच्छ से हुआ माता का सामना
एक कथा के अनुसार माता पार्वती की तपस्या देखकर शिव जी उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। माता जहां तप कर रही थीं वहीं पास में एक तालाब था। अचानक माता ने देखा कि उस तालाब में मगरमछ ने एक बच्चे को पकड़ रखा है। बच्चा ज़ोर ज़ोर से चीख रहा था तभी पार्वती जी उस बच्चे को बचाने वहां पहुंच गयी। माता को देख वह बच्चा और ज़ोर से चीखकर मदद के लिए उन्हें पुकारने लगा।

पार्वती जी ने मगरमच्छ से की विनती
बच्चे की स्थिति देखकर माता को उस पर बहुत दया आयी और वह मगरमच्छ से प्रार्थना करने लगी कि वह उस बालक को छोड़ दे। इस पर मगरमच्छ बोला कि दिन के छठे पहर में उसे जो भी मिलता है वही उसका भोजन बनता है और इसी पहर में ब्रह्मदेव ने आज उस बालक को उसके पास भेजा है इसलिए वह उसे ही खाएगा।
इस पर माता ने उससे कहा कि उस बच्चे को छोड़ने के बदले में वह उनसे कुछ भी मांग सकता है।

मगरमच्छ ने मांगा देवी पार्वती के तप का फल
माता की विनती सुनने के बाद मगरमच्छ ने उनसे कहा कि वह एक ही शर्त पर उस बच्चे की जान बख्शेगा जब देवी पार्वती अपने तप का फल जो उन्हें भोलेनाथ से प्राप्त हुआ है, उसे दे देंगी। मगरमच्छ की बात सुनकर देवी पार्वती फ़ौरन तैयार हो गयीं। मगरमच्छ ने उन्हें दोबारा विचार कर लेने को कहा किन्तु माता ने उससे कहा कि उन्होंने निश्चय कर लिया है। इतना कहकर माता ने अपने तप का फल उस मगरमच्छ को दे दिया।

जब शिव जी माता पार्वती के सामने हुए प्रकट
जैसे ही माता ने अपने तप का दान किया मगरमच्छ का पूरा शरीर तेज़ से चमकने लगा। तब उसने माता को कहा कि अपनी भूल सुधार कर वे दोबारा अपनी तपस्या का फल उससे वापस ले सकती है।
किन्तु माता ने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वह दोबारा तपस्या करके शिव जी से वरदान प्राप्त कर सकती हैं किन्तु उस बालक के प्राण दोबारा वापस नहीं आ पाएंगे।
माता मन ही मन फिर से अपनी तपस्या आरंभ करने का विचार कर ही रही थी कि तभी महादेव उनके सामने प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती जी को बताया कि मगरमच्छ और बालक दोनों का रूप उन्होंने माता की परीक्षा लेने के लिए धारण किया था।
भोलेनाथ ने माता पार्वती को बताया कि वे उनकी परीक्षा में सफल हुईं और उन्हें दोबारा तपस्या करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके पश्चात बड़े ही धूमधाम से शिव जी और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ।



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