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ढ़ोंगी साधु के मौन जवाब

एक दिन, उसके दोनो चेले बाहर गए हुए थे। तभी एक तीर्थयात्री, चुप बैठे साधु के पास आया। उसने ढोंगी साधु से पूछा- बुद्धा क्या है? ढ़ोंगी साधु अपने चेलों के बिना उत्तर देने में असहाय था। उसने असहाय होकर उसके चेहरे से अपने चेहरे तक नजर घुमाई, तब तक तीर्थयात्री दूसरे प्रश्न के लिए तैयार हो गया। उसने पूछा- धर्म क्या है? अज्ञानी साधु ने पहले ऊपर देखा, फिर नीचे देखा। ऐसा लग रहा था मानों वह स्वर्ग या नर्क से मदद मांग रहा हो।
तीर्थयात्री ने फिर पूछा- जैन क्या है? अब ढोंगी साधु झेल नहीं पा रहा था, उसने अपनी ऑखें बंद कर ली और चुप होकर बैठ गया। तीर्थयात्री ने पुन: आखिरी प्रश्न पूछ दिया- आर्शीवाद क्या है? ढोंगी साधु ने हताश और निराश होकर, अपने अज्ञानी होने को कबूलते हुऐ अपने हाथों को फैला दिया।
र्थयात्री, साधु के साथ हुई मुलाकात से बहुत खुश था और अपनी यात्रा पर आगे बढ़ने के लिए उस स्थान को छोड़ दिया। रास्ते में, उसे ढोंगी साधु के दोनों चेले मिले। उसने, उन दोनों को, साधु के साथ हुई महान मुलाकात और साधु के द्वारा दिऐ जाने वाले सही जवाबों के बारे में बताया। उसने कहा- जब मैनें पूछा कि बुद्धा क्या है? आपके गुरू ने इशारे से पूर्व से पश्चिम देखा मतलब बुद्धा को यहां और वहां नहीं पाया जा सकता है जो कि लोग आमतौर पर करते है।
तीर्थयात्री ने आगे बढ़ते हुए कहा- मेरे दूसरे सवाल के लिए, धर्म क्या है? गुरू ऊपर और नीचे देख रहे थे जो कि यह बताता है कि ऊॅचा-नीचा, शुद्ध- अशुद्ध आदि का धर्म में कोई मतलब नहीं और यही धर्म का सार है। जैन क्या है? के लिए उन्होंने अपनी ऑखें बंद कर ली और चुप बैठ गए जो यह दर्शाता है कि अगर कोई अपनी ऑखें बंद कर ले और गहरे ध्यान से बादल वाले पहाड़ों में शान्ति से सो सके तो वह वास्तव में एक महान साधु है।
मेरे आखिरी सवाल आर्शीवाद क्या है। के जवाब में उन्होने अपने हाथों को फैला दिया जिसका अर्थ है कि उनके हाथ सेवा व मदद के लिए हैं। इसके बाद वह तीर्थयात्री, गुरू के साथ हुई भेंट को चेलों के समक्ष बताकर अपने रास्ते चला गया।
दोनों चेले जानने के लिए जिज्ञासु को उठे कि कैसे उनके गुरू, उस तीर्थयात्री की प्रंशसा के पात्र बन गए? ढोंगी साधु ने उन दोनों को देख लिया। उसने अपने शिष्यों को दिमाग शान्त करते हुए एक जिज्ञासु भिक्षु के सामने शर्मिंदगी से मरने का विवरण बताया, जब वह उन्हे छोड़ कर चले गए थे।



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