करूणा की वृद्धि

chess
एक जवान आदमी, अपने जीवन के कड़वे अनुभवों से काफी निराश था। उसने एक मठ के गुरू से, कष्‍टों से बचने के लिए अनुरोध किया। उसने गुरू को बतलाया कि वह लम्‍बे समय तक किसी भी कार्य को करने में असमर्थ है।

उसने कहा कि वह कई वर्षो तक ध्‍यान, अध्‍ययन और तपस्‍या में संलग्‍न नहीं रह सकता है वरना वह दुनिया के उन पुराने दिनों में वापस चला जाएगा और उसका पतन हो जाएगा।

गुरू ने उसे आश्‍वासन दिया और पूछा- वह कौन सा विषय है जिस पर वह अपना ध्‍यान लगा सकता है। जवान व्‍यक्ति ने जवाब दिया कि वह काफी धनी था,उसने जीवन में कभी कोई काम नहीं किया। लेकिन उसने शतरंज के खेल में अपनी दिलचस्‍पी के बारे में बताया और कहा कि वह बहुत अच्‍छा शतरंज खेल लेता है।

गुरू ने एक चेले को बुलाया और कहा कि इस तरह के एक और मनुष्‍य को बुलाओ। साथ ही उस शिष्‍य को शतरंज लाने को कहा। शिष्‍य को खेल के बारे में ज्‍यादा कुछ नहीं पता था, क्‍योंकि उसने केवल एक या दो बार ही शतरंज खेला था लेकिन गुरू के बुलावे पर वह शतरंज लेकर आ गया।

गुरू ने शिष्‍य से कहा- तुम मुझे अपने गुरू के रूप में आज्ञाकारी शिष्‍य होने के नाते वादा करो कि तुम अपने वचन पर अडि़ग रहोगे। मैं इस आदमी के साथ शतरंज खेलना चाहता हूं जो कि इस खेल में निपुण है। अगर तुम हार जाते हो तो तुम अपनी जिंदगी को भी मेरी तलवार से हार जाओगे। लेकिन अगर तुम अपने प्रतिद्धन्‍दी का जीवन जीत जाते हो तो तुम्‍हे बख्‍शा नहीं जाएगा। यह कहकर वह शतरंज की विसात के पास खड़े होकर खेल को देखने लगे।

Story first published: Saturday, August 18, 2012, 13:31 [IST]
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