थूकना या प्रणाम करना

Buddha
फिलिप कापलेयु और प्रोफेसर फिलिप्‍स, रायटाकुजी मठ में आए हुऐ थे जिन्‍हे मठाधीश सोईन नाकागावा के द्वारा वहां के स्‍थानों पर घुमाया जा रहा था। वे दोनों चीनी गुरूओं की कहानियों से काफी प्रभावित और परेशान थे जो कि पवित्र ग्रंथो और बुद्ध के चित्रों को नष्‍ट करने के बाद स्‍वंय को संलग्‍नकों से मुक्‍त कराने की कोशिश करते रहे।

दोनो आंगतुक काफी हैरान थे और हाकउयीन जैनजी जोकि मठ के संस्‍थापक थे, उनकी प्रतिमा का उद्घाटन करने आऐ थे। वे घबराऐ हुऐ थे, तभी रोशी ने उन्‍हे प्रतिमा को जलती हुई धूप से श्रंद्धाजलि देने के लिए आमंत्रित किया। इसके बाद, नाकागावा

प्रतिमा के समक्ष झुकते है तो दर्शक भड़क जाते है और कहते है- पुराने चीनी गुरू, बुद्ध की प्रतिमा के सामने झुकते थे या झगड़ा करते थे। तुम क्‍यों झुक रहे हो?

रोशी ने उत्‍तर दिया- अगर तुम थूकना या झगड़ा करना चाहते हो तो करो, लेकिन मैं झुकना ही पंसद कंरूगा।

व्‍यक्ति को धार्मिक बनने के लिए जमीनी स्‍तर से जुड़ाव होना बेहद आवश्‍यक होता है।

Story first published: Tuesday, August 14, 2012, 9:57 [IST]
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