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ऐसे शुरु हुई मंदिर के ऊपर ध्वजा लगाने की परंपरा, दर्शन मात्र से जीवन में होता है सब शुभ
हिन्दू मंदिरों के शिखर पर कलश और उसके साथ लहराती हुई पताका आपने जरुर देखी होगी। त्रिकोणीय आकार के ध्वज, मंदिर के सबसे ऊपरी भाग में लहराते रहते हैं। सामान्यतः उन ध्वजों पर कोई प्रतीक चिन्ह भी दिखाई देता है। आमतौर पर ध्वज का रंग केसरिया या गेरुआ होता है किन्तु विशेष कारणों से ध्वजों का रंग पीला, लाल या अन्य रंग भी हो सकता है। क्या आपने सोचा है कि ये ध्वज मंदिर के शिखर पर क्यूँ लगाए जाते हैं? ध्वज लगाने की परंपरा कब शुरू हुई? इन ध्वजों को देखकर भक्त प्रणाम क्यों करते हैं? और ध्वज का आकार त्रिकोणीय ही क्यों होता है? आइये आपको बताते हैं।

ध्वज लगाने की परंपरा कब शुरू हुई?
ऐसी मान्यता है की पहले देवों और असुरो में युद्ध होता रहता था। देवासुर संग्राम तो आपने सुना ही होगा। इस युद्ध में मायावी असुर अपना भेष बदल सकते थे। कौन किस पक्ष से युद्ध कर रहा है इसकी पहचान के लिए देवों ने अपने रथों के ऊपर ध्वज लगाना शुरू किया। तभी से देवों के मंदिरों पर भी ध्वज लगाने की परंपरा शुरू हुई।

ध्वज मंदिर के शिखर पर क्यूँ लगाए जाते हैं?
ऐसा माना जाता है कि ध्वजा नवग्रह को धारण किये होती है, जो रक्षा कवच का काम करती है। ये ध्वज मंदिर की रक्षा करते हैं। दूसरी बात ये है कि ध्वज देखने और प्रणाम करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है लेकिन ध्वज तभी दिखेगा जब ये ऊंचाई पर हो इसलिए इसे मंदिर के शिखर पर लगाते हैं ताकि दूर से ही दिख जाए।

इन ध्वजों को देख कर भक्त प्रणाम क्यों करते हैं?
शास्त्रों में कई जगह लिखा गया है कि "शिखर दर्शनम पाप नाशम"। इसका अर्थ है कि शिखर के दर्शन कर लेने से पाप नष्ट हो जाते हैं। किसी कारण से मंदिर ना जा पाएं तो ध्वज को ही प्रणाम कर लें। ऐसा करना शुभकारी होता है।

ध्वज का आकर त्रिकोणीय ही क्यों होता है?
इसका वैज्ञानिक कारण है। वायुगतिकी के अनुसार एक त्रिकोणीय झंडे को फहराने के लिए न्यूनतम हवा का वेग चाहिए। वहीं एक आयताकार ध्वज को फहराने के लिए ज्यादा हवा का वेग चाहिए। त्रिकोणीय आकार के पीछे मंशा यही है कि कम हवा में भी ध्वज लहराता रहे।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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