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साईकिल क्यों चलाये

पहले छात्र ने कहा, "यह साईकिल आलू का बोरा ढो रही थी। मैं इस बात से खुश हूँ कि मेरी पीठ बोझ उठाने के दर्द से बच गई।"
गुरू खुश हुए और बोले, "तुम एक चतुर बालक हो। जब तुम बूढ़े हो जाओगे तो तुम मेरी तरह कूबड़ से बच जाओगे।"
दूसरे छात्र ने अलग उत्तर दिया, "मैं चाहता था कि सवारी करते समय मेरी आँखें वृक्षों और विशाल क्षेत्रों को देखें।"
गुरू ने सराहना करते हुए कहा, "तुम्हारी आँखें खुली हुई हैं और तुम संसार को देखो।"
तीसरे शिष्य ने और भिन्न उत्तर दिया, "जब मैं सवारी करता हूँ तब मैं ‘नाम म्योहो रेंगे क्यों' मन्त्र का जाप करता हूँ।"
तब गुरु खुश हुए और बोले, तुम हर तरह की समस्या से आसानी से जूझ सकते हो।
चौथे छात्र ने कहा, साइकिल चलाना, जीवन में सही सामांजस बिठाने जैसा है।
गुरु खुश हुये और उत्तर दिया, तुम वास्तव में स्वर्ण पथ सवारी कर रहे हो, जो बिना किसी को नुकसान पहुंचाए या अंहिसा का पथ है।
पांचवे छात्र ने उत्तर दिया, मैं साइकिल केवल साइकिल चलाने के लिये चलातू हूं।
गुरु छात्र के पास आगे बढे और उसके चरणों में बैठ कर बोले, मैं तुम्हारा शिष्य हूं।



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