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Varuthini Ekadashi Ki Katha: श्रीहरि विष्णु की कृपा पाने के लिए आज जरूर पढ़ें वरुथिनी एकादशी व्रत कथा
Varuthini Ekadashi Ki Vrat Katha: हिन्दू पंचांग के अनुसार हर माह में दो एकादशी तिथियाँ आती हैं जो भगवान विष्णु को ख़ास तौर पर समर्पित होती है। हिन्दू परंपरा में एकादशी व्रत का बहुत ही ख़ास महत्व है। वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को वरूथिनी एकादशी मनाई जाती है। इस दिन भगवान् विष्णु व माता लक्ष्मी की ख़ास पूजा अर्चना की जाती है। साथ ही इस दिन व्रत का पालन करने और जल संबंधी दान करने से पापों व दुखों से भक्त को मुक्ति मिलती है।
इस वर्ष 4 मई को वरूथिनी एकादशी का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन व्रत का पलान करके भगवान विष्णु की अराधना में वरूथिनी एकादशी व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है। पेश है वरूथिनी एकादशी व्रत कथा -

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Ki Vrat Katha)
बेहद प्राचीन समय की बात है, मान्धाता नाम के राजा नर्मदा नदी के तट पर एक राज्य पर शासन करते थे। वे अत्यंत दानशील तथा तपस्वी स्वभाव के थे। वे कई बार जंगल में जाकर गहरा तप किया करते थे। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहे थे, तभी कहीं से जंगली भालू आया और अचानक से वह राजा का पैर चबाने लगा। कुछ क्षणों के लिए तो राजा अपनी तपस्या में लीन रहे। वह भालू तपस्या में लीन रजा का पैर चबाते चबाते उन्हें घसीटकर जंगल के गहराई में ले गया। थोड़ी देर में रजा तपस्या की मुद्रा से निकले और भालू को देख्कदेखकर बहुत घबराए। मगर तप के धर्म के अनुकूल उन्होंने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की। राजा ने करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। उनकी पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला।
राजा मान्धाता का पैर भालू पहले ही खा चुका था। यह देखकर राजा बहुत ही दुखी और शोकाकुल हुए। उन्हें दुखी देखकर भगवान श्री हरि विष्णु बोले: "हे वत्स! तुम दुखी मत हो! तुम मथुरा प्रांत जाओ और वरुथिनी एकादशी का व्रत पालन करके मेरी वराह अवतार की मूर्ति की पूजा करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम पुन: पूर्ण व अच्छे अंगों वाले हो जाओगे।" उन्होंने राजा को बताया कि इस भालू का काटना तुम्हारे पूर्व जन्म के अपराधों का नतीजा हैं।
भगवान विष्णु की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता ने मथुरा जाकर पूरी श्रद्धा से वरुथिनी एकादशी का व्रत सफ़ल किया। वरूथिनी एकादशी के प्रभाव से राजा शीघ्र ही सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गये। इसी एकादशी के प्रभाव से राजा मान्धाता को मृत्यु के पश्चात मोक्ष व स्वर्ग की प्राप्ति हुई।
जो भी भक्त भय से पीड़ित हैं उन्हें वरूथिनी एकादशी का व्रत रखना चाहिए, विष्णु की अर्धना और सच्चे मन से उनका स्मरण करना चाहिए।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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