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Varuthini Ekadashi Vrat Katha: वरुथिनी एकादशी पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, मिलेगा 10 हजार साल की तपस्या जितना फल
Varuthini Ekadashi Vrat Katha: हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन वरुथिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस साल 13 अप्रैल को वरुथिनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। 'वरुथिनी' शब्द का अर्थ है कवच या रक्षा करने वाला। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त इस दिन पूरी श्रद्धा से व्रत रखता है, भगवान विष्णु स्वयं एक कवच की तरह उसकी हर संकट से रक्षा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान पूर्वक पूजा करने से और व्रत रखने से साधक को 10 हजार वर्षों तक तप करने जितना शुभ फल प्राप्त होता है। इस दिन पूजा के दौरान वरुथिनी एकादशी व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। मान्यता है कि इस कथा का पाठ करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। तो आइए, पढ़ते हैं वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा -

वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha In Hindi)
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, प्राचीन समय में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक एक पराक्रमी और धर्मपरायण राजा का शासन था। वे केवल एक शासक ही नहीं, बल्कि भगवान के परम भक्त भी थे और अपना अधिकांश समय जप-तप और साधना में व्यतीत करते थे। अपनी प्रजा के प्रति उनका व्यवहार अत्यंत करुणामय और स्नेहपूर्ण था।
एक दिन राजा वन में तपस्या में लीन थे, तभी अचानक एक भालू ने आकर उनके पैर को अपने जबड़े में जकड़ लिया और उन्हें घसीटते हुए जंगल की ओर ले जाने लगा। संकट की इस घड़ी में राजा ने भगवान विष्णु का स्मरण किया। अपने भक्त की पुकार सुनकर भगवान विष्णु तुरंत वहां प्रकट हुए और अपने सुदर्शन चक्र से भालू का वध कर राजा को उसके चंगुल से मुक्त कराया।
हालांकि, भालू के हमले से राजा का पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था, जिससे वे अत्यंत दुखी हो गए। तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि यह कष्ट उनके पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम है। राजा ने विनम्रता से पूछा कि इस पीड़ा से मुक्ति पाने का उपाय क्या है।
इस पर भगवान विष्णु ने उन्हें मथुरा जाकर वरुथिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करने और उनके वाराह अवतार की श्रद्धा से पूजा करने का निर्देश दिया। भगवान की आज्ञा का पालन करते हुए राजा मान्धाता ने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उनका क्षतिग्रस्त अंग पुनः स्वस्थ हो गया और उन्हें पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति हुई।
मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विधि-विधान से वरुथिनी एकादशी का व्रत करता है और इसकी कथा का पाठ करता है, उसे सुख, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। साथ ही, उसे हजारों वर्षों के तप के समान पुण्य फल भी मिलता है।



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