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इस कथा के बिना अधूरा है योगिनी एकादशी व्रत, मिलता है 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य
Yogini Ekadashi Vrat Katha 2026 In Hindi: वैसे को हर एकादशी का अपना खास महत्व होता है लेकिन बात योगिनी एकादशी की करें तो हिंदू धर्म में इसकी बहुत मान्यता है। 10 जुलाई 2026, दिन शुक्रवार को योगिनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु की पूजा करने और योगिनी एकादशी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत का पुण्य 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर माना गया है। आइए जानते हैं योगिनी एकादशी की संपूर्ण कथा, व्रत का महत्व और इससे मिलने वाले पुण्य के बारे में।

योगिनी एकादशी व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यता है कि योगिनी एकादशी का व्रत करने और इसकी कथा सुनने से सभी पापों का नाश होता है। भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और सभी रोग, कष्ट और दुर्भाग्य दूर होते हैं। एकादशी व्रत रखने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है और मृत्यु के बाद विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। साथ ही ये भी मान्यता है कि इस दिन उपवास करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य प्राप्त होता है।
योगिनी एकादशी के दिन क्या करें?
प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करें।
पीले वस्त्र, तुलसी दल, पीले फूल और पंचामृत अर्पित करें।
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।
योगिनी एकादशी व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें।
जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान करें।
अगले दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें।
योगिनी एकादशी के दिन क्या न करें?
चावल न खाएं।
मांस-मदिरा और तामसी भोजन का सेवन न करें।
झूठ न बोलें और किसी मजबूर को न सताएं।
व्रती लोग इस दिन कपड़ें न धोएं और न ही बाल धोएं।
योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा
पद्म पुराण के अनुसार, प्राचीन समय में अलकापुरी नामक नगर में धन के देवता कुबेर का राज्य था। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे और प्रतिदिन मानसरोवर से ताजे पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा करते थे। इस कार्य की जिम्मेदारी हेममाली नामक एक यक्ष को दी गई थी। हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था। वह अपनी पत्नी के प्रेम में इतना अधिक डूबा रहता था कि एक दिन भगवान शिव की पूजा के लिए समय पर फूल लाना ही भूल गया।
कुबेर भगवान शिव की पूजा के लिए फूलों का इंतजार करते रहे। जब काफी देर तक हेममाली नहीं पहुंचा तो उन्होंने अपने सेवकों को उसे बुलाने भेजा। सेवकों ने जाकर देखा कि हेममाली अपनी पत्नी के साथ आनंद में मग्न था। यह सुनकर कुबेर अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने हेममाली को दरबार में बुलाकर कहा कि भगवान शिव की सेवा में लापरवाही करना बहुत बड़ा अपराध है। क्रोध में आकर कुबेर ने हेममाली को कोढ़ (कुष्ठ रोग) होने का श्राप दे दिया और अलकापुरी से निष्कासित कर दिया।
महर्षि मार्कंडेय ने बताया व्रत का उपाय
श्राप के कारण हेममाली का शरीर रोगग्रस्त हो गया और वह जंगलों में भटकने लगा। एक दिन भटकते-भटकते वह महान तपस्वी महर्षि मार्कंडेय के आश्रम पहुंचा। हेममाली ने ऋषि को अपनी पूरी कहानी सुनाई और श्राप से मुक्ति का उपाय पूछा। महर्षि मार्कंडेय ने कहा- "यदि तुम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करोगे और भगवान विष्णु की आराधना करोगे, तो तुम्हें इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।"
योगिनी एकादशी व्रत का चमत्कार
महर्षि के बताए अनुसार हेममाली ने पूरे श्रद्धाभाव से योगिनी एकादशी का व्रत रखा, भगवान विष्णु की पूजा की और द्वादशी के दिन विधिपूर्वक पारण किया। व्रत के प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग पूरी तरह समाप्त हो गया। उसे अपना सुंदर शरीर वापस मिल गया और वह पुनः अपनी पत्नी तथा अलकापुरी लौट गया। इसके बाद उसने जीवनभर भगवान विष्णु और भगवान शिव की भक्ति की।



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