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कभी 75 रुपये में साफ करते थे गाड़ियां, आज कहलाते हैं दिल्ली के खान सर; पढ़ें मनोज गर्ग की सक्सेस स्टोरी
Manoj Garg Success Story: दिल्ली में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के बीच शिक्षक मनोज गर्ग काफी लोकप्रिय हैं। वह किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नहीं हैं, फिर भी दिल्ली के कई कॉलेजों और यूनिवर्सिटी के छात्र उनसे ऑफलाइन और ऑनलाइन पढ़ते हैं। छात्रों के बीच उनकी लोकप्रियता ऐसी है कि उन्हें 'दिल्ली के खान सर' भी कहा जाता है। मनोज गर्ग ने बेहद कम उम्र में मुश्किल दौर देखा। 9 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद वह मां के साथ नानी के घर रहने लगे। परिवार की परिस्थितियों के बीच उन्होंने लोगों की गाड़ियां साफ कर पैसे कमाए और एक गाड़ी साफ करने के बदले करीब 75 रुपये मिलते थे। वह भीड़ वाली बसों का इंतजार करते थे, ताकि कंडक्टर उनसे टिकट न ले। आज वह दिल्ली में दो बड़े कोचिंग सेंटर चलाते हैं और उनके कई छात्रों के IAS-IPS बनने का दावा किया जाता है।

75 रुपये से शुरू हुआ सफर, PMG तक पहुंची मनोज गर्ग की मेहनत
मनोज गर्ग की आज पहचान एक शिक्षक और कोचिंग संचालक के तौर पर है, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता काफी मुश्किल रहा। उनकी कोचिंग को PMG कहा जाता है, जिसका पूरा नाम 'पूरन मनोज गर्ग' है। 'पूरन' उनके दादा का नाम है। साल 2014 में उन्होंने PMG कोचिंग की शुरुआत की, हालांकि पढ़ाने का काम वह इससे कई साल पहले से कर रहे थे। उनका बचपन आर्थिक परेशानी में नहीं बीता था। परिवार में किसी चीज की कमी नहीं थी और उनके पिता समाज में सम्मानित व्यक्ति थे। लेकिन साल 1996 में पिता की मौत के बाद परिस्थितियां अचानक बदल गईं। उस समय मनोज की उम्र 9 साल 11 महीने थी और वह छठी कक्षा में पढ़ रहे थे।
पिता ही परिवार की कमाई का मुख्य जरिया थे, इसलिए उनके जाने के बाद घर की जिम्मेदारी मुश्किल हो गई। मां मनोज और उनकी बड़ी बहन को लेकर अपने मायके चली गईं। नाना ने परिवार का साथ दिया, लेकिन खर्च चलाने के लिए मनोज ने छोटी उम्र में ही काम शुरू कर दिया। स्कूल जाने से पहले वह लोगों की गाड़ियां साफ करते थे और एक गाड़ी के बदले 75 रुपये कमाते थे। पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू किया। दिल्ली के लॉरेंस रोड में वह पहली कक्षा के एक बच्चे को पढ़ाते थे। वहां पहुंचने के लिए कई बार उन्हें पैदल काफी दूरी तय करनी पड़ती थी। कभी-कभी वह इतनी भीड़ वाली बस का इंतजार करते थे कि बस में चढ़ने के बाद कंडक्टर टिकट मांग ही न पाए। काम की तलाश में उन्होंने गत्ता बनाने वाले प्लांट में भी नौकरी की, जहां उन्हें 2100 रुपये मिलते थे। साल 2004 में दिल्ली यूनिवर्सिटी में बीकॉम ऑनर्स में दाखिला लेने के बाद भी उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना नहीं छोड़ा।
बहन की शादी के बाद बढ़ी घर की जिम्मेदारी
साल 2006 में उनकी बड़ी बहन की शादी हुई। उस समय परिवार के पास ज्यादा पैसे नहीं थे और शादी का खर्च जुटाना आसान नहीं था। उनकी मां साड़ियों में फॉल लगाने का काम करती थीं, जिससे उन्हें करीब 1500 से 2000 रुपये तक की कमाई होती थी। बहन भी ट्यूशन पढ़ाती थीं। बहन की शादी के बाद घर का खर्च कैसे चलेगा, यह भी एक बड़ी चिंता थी। इसी दौर में मनोज को पढ़ाने का ऐसा मौका मिला जिसने आगे की पूरी दिशा बदल दी। एक कोचिंग सेंटर ने उन्हें 9वीं और 10वीं के छात्रों को गणित पढ़ाने का मौका दिया। वहां शुरुआत में करीब 18 से 20 बच्चे थे। कुछ समय बाद उन्होंने 11वीं और 12वीं के छात्रों को अकाउंट पढ़ाना भी शुरू कर दिया।
2009 में मिला करियर का बड़ा मौका
साल 2009 में एक बड़े कोचिंग संस्थान ने मनोज गर्ग को अपने यहां पढ़ाने का ऑफर दिया। यह उनके शिक्षक करियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। संस्थान ने उन्हें लाखों रुपये की सैलरी ऑफर की थी। इसके बाद पढ़ाने के क्षेत्र में उनकी पहचान लगातार बढ़ती गई और आगे चलकर उन्होंने खुद की PMG कोचिंग शुरू की।
छात्रों की कामयाबी बनी सबसे बड़ी पहचान
मनोज गर्ग के मुताबिक, उनके पढ़ाए हुए छात्र आज देश और विदेश में अलग-अलग जगहों पर काम कर रहे हैं। उनका एक छात्र वर्ल्ड बैंक में है। वह यह भी बताते हैं कि उनके हजारों छात्र IAS, IPS और IRS बन चुके हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी से जुड़े 40 कॉलेजों में से 23 कॉलेजों में उनके पढ़ाए हुए छात्र आज असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर काम कर रहे हैं। एक समय दिल्ली में उनके चार कोचिंग सेंटर थे, लेकिन अब इनमें से दो ही संचालित हो रहे हैं। मनोज गर्ग फिलहाल ऑफलाइन पढ़ाते हैं। उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि मुश्किल हालात किसी की मंजिल तय नहीं करते। मनोज गर्ग के मुताबिक, इंसान को लगातार मेहनत करते रहना चाहिए और किसी भी स्थिति में हार नहीं माननी चाहिए।



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