Latest Updates
-
Father's Day 2026: किसी ने छोड़ी स्मोकिंग, तो कोई निभाता है नैपी ड्यूटी, ये हैं बॉलीवुड के Super Dads -
Simple Aromatic Peas Pulao Recipe: घर पर बनाएं होटल जैसा खिला-खिला मटर पुलाव -
International Yoga Day 2026: रोजाना योग करने से मिलेंगे ये 10 जबरदस्त फायदे, तन और मन रहेगा स्वस्थ -
Jamai Sasthi 2026: दामाद की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है व्रत, जानें जमाई षष्ठी का महत्व और मनाने का तरीका -
5 Minute Protein Masala Omelette Recipe: झटपट बनाएं होटल जैसा टेस्टी और हेल्दी नाश्ता -
Aaj Ka Rashifal 20 June 2026: शनिवार को इन 5 राशियों पर बरसेगी शनिदेव की कृपा, धन लाभ के प्रबल योग -
Restaurant Style Egg Masala Gravy Recipe: घर पर बनाएं होटल जैसा चटपटा अंडा मसाला -
International Yoga Day 2026: नाभि खिसकने पर करें ये 4 योगासन, मिलेगा तुरंत आराम -
कब से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध? जानें तिथि, धार्मिक महत्व और पितरों के तर्पण की सही विधि -
जुलाई 2026 में कितने दिन बंद रहेंगे बैंक? यहां देखें स्टेट वाइज छुट्टियों की लिस्ट
Holi 2026: भीलवाड़ा की अजब-गजब होली, जिंदा व्यक्ति की निकलती है शव यात्रा, फिर होता है अंतिम संस्कार
Bhilwara Holi Tradition: भारत में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि विविध परंपराओं का उत्सव भी है। कहीं लठमार होली की धूम होती है, तो कहीं फूलों से होली खेली जाती है। लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसे सुनकर कोई भी चौंक जाएगा। यहां होली के कुछ दिन बाद एक जीवित युवक की शव यात्रा निकाली जाती है, कफन ओढ़ाया जाता है और अंतिम संस्कार की तैयारी तक कर दी जाती है। पहली नजर में यह अजीब लग सकता है, लेकिन इसके पीछे गहरी सांस्कृतिक आस्था और विशेष मान्यता जुड़ी हुई है।

400 साल पुरानी परंपरा
भीलवाड़ा शहर में यह परंपरा करीब 400 साल पुरानी बताई जाती है। यह शोक का नहीं, बल्कि आस्था और प्रतीकात्मक रीति का हिस्सा होता है। इसे इला जी का डोल या मुर्दे की सवारी कहा जाता है, जो होली के सात दिन बाद यानी शीतला सप्तमी के दिन आयोजित की जाती है। माना जाता है कि यह परंपरा बुराई, नकारात्मकता और पुराने दुखों को पीछे छोड़कर नई शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
कैसे निभाई जाती है यह अनूठी रस्म?
इस दिन शहर में एक जीवित युवक की बाकायदा शव यात्रा निकाली जाती है। उसे कफन ओढ़ाया जाता है और लोग उसे अर्थी पर लिटाते हैं। इसके बाद गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों के साथ उसकी शव यात्रा पूरे शहर में निकाली जाती है। इस अनोखी रस्म को देखने के लिए हजारों लोग सड़कों पर उमड़ पड़ते हैं। लोग गुलाल उड़ाते हैं, नाचते-गाते चलते हैं और इस अनोखे जुलूस में उत्साह के साथ शामिल होते हैं। यात्रा जब अपने अंतिम पड़ाव पहुंचती है, तो अंतिम संस्कार की तैयारी की जाती है।
अचानक उठ खड़ा होता है युवक
इस परंपरा में जब श्मशान में सब लोग अंतिम संस्कार की तैयारी में जुटे होते हैं। जैसे ही रस्म शुरू होने वाली होती है, तब ही अर्थी पर लेटा युवक अचानक उठ बैठता है और देखते ही देखते भीड़ में दौड़ जाता है। इसके बाद उसकी जगह घास-फूस से बने एक पुतले को अर्थी पर रखकर उसका अंतिम संस्कार किया जाता है।
क्या संदेश देती है यह अनोखी परंपरा?
भीलवाड़ा शहर की इस अनोखी रस्म के पीछे एक गहरा संदेश छुपा है। यह रस्म पुराने दुख, नकारात्मक सोच और बुराइयों को विदा करने और नई ऊर्जा और नई शुरुआत का स्वागत करनइ का प्रतीक है। इला जी का डोल लोगों को यह संदेश देता है कि हर अंत के बाद एक नई शुरुआत जरूर होती है। जीवन में जो बीत गया, उसे यहीं छोड़ दो। नई ऊर्जा, नई उम्मीद और नई शुरुआत के साथ आगे बढ़ो। मान्यता है कि यही भीलवाड़ा की इस अनोखी होली की असली पहचान है।



Click it and Unblock the Notifications