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ज़ालिम डायर ने जब खेली ख़ूँखार ख़ून की होली.... जलियांवाला बाग के शहीदों की याद में ऐसे दें श्रद्धांजलि
Jallianwala Bagh Massacre 2024: हर साल 13 अप्रैल की तारीख आते ही, फिर से सबके जेहन में जनरल डायर के क्रूरता का मंजर उतार आता है। आज भी उस जगह पर 105 साल पहले हुए उस बर्बरता के निशान मौजूद हैं जो हमें वो तबाही का मंजर भूलने नहीं देती है।
Jallianwala Bagh Massacre आजादी के इतिहास का काली स्याही से लिखा पन्ना है जिसका जिक्र होते ही लोग उस दृश्य को सोचकर ही सिहर उठते हैं। आज के ही दिन ब्रिटिश राज के जनरल रेजिनाल्ड डायर अमृतसर ने जालियांवाला बाग में सभा के लिए इक्ट्ठा हुए लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाकर निर्दोष लोगों को बर्बरतापूर्ण मार डाला था।

इस नरसंहार में 1000 लोग मारे गए थे और 1200 से अधिक लोग घायल हुए थे। मारे गए लोगों में बच्चो से लेकर 90 साल तक के बुजुर्ग तक शामिल थे। जालियांवाला बाग में मारे गए लोगों की याद में और श्रद्धाजंलि देने के लिए हर साल 13 अप्रैल को जलियांवला बाग में शहादत दिवस मनाया जाता है। आप भी शहीदों को नमन करने के लिए अपने दोस्तों और करीबियों को ये श्रद्धांजलि संदेश शेयर कर सकते हैं।
जलियांवाला बाग शहीदों को श्रद्धाजंलि संदेश
1. चलो आज फूल चढ़ाते हैं, शहीदों की मज़ार पर, जिसने कर दी अपनी जान कुर्बान,वतन के नाम पर। चलते थे जो सरहदों पर, अपना सीना तान कर, खाई जिसने गोली,देश की आन,बान,शान पर ।
जलियांवाला बाग के शहीदों को नमन
2. जो भारत मां के लिए शहीद हुए,
देश के उन वीरों को सलाम है,
अपने खून से जिस जमीं को सींचा,
शहादत देने वाले उन जवानों सलाम है!
जलियांवाला बाग के शहीदों को शत-शत नमन
3. शहादत के किस्से, इंकलाब की कहानी,
बरसों तक याद करेगा हर शख्स वीर जवानों की कुर्बानी।
जलियांवाला बाग के शहीदों को नमन
4. जलियांवाला बाग के शहीद हुए,
भारत मां के वीर सपूतों को कोटि-कोटि नमन एवं श्रद्धांजलि!
जलियांवाला बाग के शहीदों को नमन!
5. जो देश के लिए शहीद हुए उनको मेरा सलाम है,
अपने खूं से जिस जमीं को सींचा उन बहादुरों को सलाम है!
जलियांवाला बाग के शहीदों को शत-शत नमन
जलियांवाला बाग पर श्रद्धांजलि कविताएं.... (Jallianwala bagh massacre Poem )
1. आया तेरह अपै्रल दिवस फिर लेकर सुधियों की माला।
था देशवासियों को जिस दिन जल्लाद बना जलियांवाला॥
अमृतसर की उस धरती को था कंपित किया तबाही ने।
अत्याचारों का नृत्य किया जब खुल कर तानाशाही ने॥
रो उठीं बाग की दीवारें हर दिशा ख़ौफ़ से डोली थी।
ज़ालिम डायर ने जब खेली ख़ूँखार ख़ून की होली थी।
गुमनाम शहीदों की गणना ख़ुद मौत न कर पाई होगी।
निष्ठुरता भी चीखी होगी, निर्ममता चिल्लाई होगी॥
कितनी ही कोमल कलियों ने, बच्चों ने वृद्ध जवानों ने।
बलिवेदी को रँग डाला था आज़ादी के परवानों ने॥
भारत माता के जो सपूत दुख झेल गए बर्बादी का।
उनके शोणित से लिखा गया इतिहास नया आज़ादी का॥
आतंक, दमन, उत्पीड़न का जब चक्र चलाया जाता है।
निर्दोष मनुजता का जी भर जब रक्त बहाया जाता है॥
इतिहास गवाही देता है चलती न सदा मनमानी है।
परिवर्तन आकर ही रहता, रंग लाती हर कुर्बानी है॥
कितनी भी रात अंधेरी हो सूरज न कभी रुक पाता है।
पतझर भी आकर उपवन को नूतन वसन्त दे जाता है॥
गुलज़ार हुआ जिनके दम से गुलशन अपनी उम्मीदों का।
श्रद्धा सुमनों से बार-बार वन्दन उन अमर शहीदों का॥
~महावीर प्रसाद 'मधुप'
2. यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।
परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।
लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।
कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।
- सुभद्राकुमारी चौहान



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