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कौन थे क्रांतिकारी कोमाराम भीम, जिनका रोल जूनियर एनटीआर ने RRR मूवी में किया था प्ले
जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब भारत भूमि पर कई महान और साहसी वीर पुरुषों ने जन्म लिया, जिन्होंने अन्याय के खिलाफ सिर झुकाने के स्थान पर सिर कटाना अधिक बेहतर समझा। ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे कोमाराम भीम। हैदराबाद तेलंगाना के आदिलाबाद जिले में जन्मे कोमाराम भीम गोंड समुदाय से संबंध रखते थे। उन्होंने बचपन से ही अपने समुदायों पर होने वाले अत्याचारों को बेहद करीब से देखा था। यहां तक कि उनके पिता भी इस अन्याय की आहूति चढ़ गए। जिसके कारण उनके मन में विद्रोह की आग पैदा हुई और उन्होंने खुद की विद्रोही सेना बनाकर निजाम और अंग्रेजों की तानाशाही का मुंहतोड़ जवाब दिया। कुछ समय पहले रिलीज हुई फिल्म आरआरआर में जूनियर एनटीआर ने भी कोमाराम भीम की भूमिका निभाई। तो चलिए आज इस लेख में हम आपको भारतीय क्रांतिकारी कोमाराम भीम के बारे में बता रहे हैं-

कौन थे कोमाराम भीम
कोमाराम भीम 1901 में हैदराबाद वर्तमान में तेलंगाना के आदिलाबाद जिले में जन्मे गोंड समुदाय के सदस्य थे। वह चंदा और बल्लालपुर राज्यों के आबादी वाले जंगलों में पले-बढ़े थे। अपने बचपन के दौरान, उनका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं था और उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी।

यूं पैदा हुई विद्रोह की भावना
कोमाराम भीम का भले ही बाहरी दुनिया से बहुत अधिक संपर्क नहीं रहा हो, लेकिन फिर भी उनके मन में विद्रोह की भावना बचपन से ही पनपने लगी थी। वह जमींदारों, पुलिस अधिकारियों और व्यापारियों के हाथों अपने समुदाय के संघर्षों की कहानियों को सुनकर बड़े हुए थे। यहां तक कि उन्होंने यह शोषण अपनी आंखों से भी देखा। आदिवासी बच्चों पर अवैध रूप से पेड़ काटने का आरोप लगाकर उंगलियां काट दी जाती थी। गोंड समुदाय के सदस्यों से जबरदस्ती टैक्स वसूला जाता था, उन पर झूठे केस दर्ज किए जाते थे। यहां तक कि उनकी जमीन पर खेती के अधिकार भी छीन लिए गए। यहां तक कि भीम के पिता को वन अधिकारियों ने आदिवासी अधिकारों का दावा करने के लिए मार डाला। भीम इस हत्या से बुरी तरह आहत हुए थे और पिता की मृत्यु के बाद, उनका परिवार सांकेपल्ली से सारदापुर चला गया।

निजाम के अधिकारी की उन्होंने हत्या
कोमाराम भीम ने अक्टूबर 1920 में सिद्दीकीसाब नाम के निजाम के एक वरिष्ठ अधिकारी की हत्या कर दी। सिद्दीकीसाब को जमींदार लक्ष्मण राव ने फसल को जब्त करने के लिए भेजा था। हत्या के तुरंत बाद कोमाराम भीम गिरफ्तारी से बचने के लिए भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस दौरान उनकी मुलाकात विटोबा के साथ हुई, जो निजाम और अंग्रेजों के खिलाफ एक पत्रिका चला रहे थे। भीम ने विटोबा से अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू सीखी। लेकिन जल्द ही विटोबा को पुलिस अधिकारियों ने गिरफ्तार कर लिया, जिसके बाद कोमाराम भीम ने असम की तरफ पलायन किया। वहां पर उन्होंने एक चाय प्लांट में काम किया। वहां पर भी वह श्रमिक संघ की गतिविधियों में शामिल हुए। असम में रहने के दौरान कोमाराम भीम ने 1922 के अल्लूरी सीताराम राजू के रम्पा विद्रोह को सुना। जिसने उन्हें बहुत अधिक प्रेरित किया और बल्लारशाह लौटने के तुरंत बाद उन्होंने आदिवासियों के अधिकारों के लिए अपनी आवाज उठाने का फैसला किया।

जल जंगल जमीन का दिया नारा
बल्लारशाह लौटने के बाद उन्होंने अपने समुदाय के सदस्यों के साथ मिलकर भूमि अधिकारों के विरोध में छापामार सेना का गठन किया। उन्होंने समूह को एक अलग गोंड राज्य के रूप में घोषित करने की योजना का भी प्रस्ताव रखा। उन्होंने जल, जंगल और जमीन का नारा दिया। उनके इस नारे ने समुदाय के सदस्यों को भूमि, भोजन और स्वतंत्रता पर उनके अधिकार के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। कोमराम ने 1928 से लेकर 1940 तक निजाम के खिलाफ लगातार संघर्ष किया। उनके इस विद्रोह से निजाम और अंग्रेजों के बीच एक अलग सा डर पैदा हो गया था।
यूं हुई मृत्यु
तमाम प्रयासों के बाद जब निजाम कोमाराम भीम को पकड़ने में असफल रहा तो निजाम ने मुखबिर बनने के लिए गोंड समुदाय के एक सदस्य को रिश्वत दी। बाद में, सितंबर 1940 में भीम और उसकी सेना को पकड़ा गया और उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया। लेकिन कोमाराम भीम इसके लिए राजी नहीं थे। ऐसे में गोंड नेता के अलावा 15 योद्धा शहीद हो गए। जिसके बाद भीम सहित कई शवों को बिना किसी औपचारिकता के जला दिया गया था। निजाम को लगता था कि भीम पारंपरिक मंत्रों को जानता था और उन्हें डर था कि वह वापस जीवित हो जाएगा। इसलिए, उन्होंने तुरंत उसके शरीर को जला दिया।



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