दाल-चावल खाने वाले मगरमच्छ की मौत पर खूब रोया पूरा गांव, याद में बनाया जाएगा मंदिर

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के गांव बवामोहतरा के तालाब में अचानक एक मगरमच्‍छ की मौत के बाद पूरा गांव शौक में डूब गया। इस मगरमच्‍छ की मौत के बाद पूरा गांव ने उसकी शवयात्रा भी न‍िकाली। गांव वालों की माने तो ये मगरमच्‍छ जिसे प्‍यार से गंगाराम कहकर बुलाया जाता था, वो इस गांव के तालाब में पिछले 100 साल से रह रहा था।

उसने इस गांव में रहते हुए किसी पर हमला नहीं किया था बल्कि मगरमच्‍छ होने के बाद भी अपने मैत्री व्‍यवहार के वजह से वो पूरे गांव का प्रिय बन चुका था। बच्चे भी तालाब में उसके करीब तैर लेते थे। लेकिन मंगलवार तड़के सुबह गंगाराम की मुत्‍यु से पूरा गांव गमगीन हो गया है। आइए जानते है कौन था गंगाराम और मगरमच्‍छ होने के बावजूद क्‍यों गांव वाले उसे पसंद करते थे?

130 साल का था गंगाराम

130 साल का था गंगाराम

मंगलवार सुबह अचानक गंगाराम पानी के ऊपर आ गया। जब मछुआरों ने पास जाकर देखा तो गंगाराम की मौत हो चुकी थी। गंगाराम का शव तालाब से बाहर निकाला गया, बाद में इसकी सूचना वन विभाग को दी गई। जिसके बाद गंगाराम को श्रद्धांजलि देने के लिए पूरा गांव इकट्ठा हो गया। दूर-दूर से लोग गंगाराम के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।

मगरमच्छ की आयु लगभग 130 वर्ष की थी।

दाल चावल खाता था

दाल चावल खाता था

अक्‍सर देखा गया है कि किसी तालाब में मगरमच्छ की खबर के बाद ही लोग वहां पर जाना छोड़ देते हैं। लेकिन गंगाराम के साथ ऐसा नहीं था। उसने कभी किसी भी ग्रामीण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। जब कोई तालाब में नहाते समय गंगाराम से टकरा जाते थे तो वह खुद ही दूर हट जाता था। तालाब में मौजूद मछलियां ही गंगाराम का आहार थी। मगरमच्छ गंगाराम को लोग घर से लाकर दाल चावल भी खिलाते थे और वह बड़े चाव से खाता था।

 पालतू मगरमच्‍छ था

पालतू मगरमच्‍छ था

ग्रामीणों के मुताबिक इस गांव में महंत ईश्वरीशरण देव यूपी से आए थे, जिन्‍हें सिद्ध पुरूष माना जाता था। वही अपने साथ पालतू मगरमच्छ लेकर आए थे। उन्होंने गांव के तालाब में उसे छोड़ा था। बताते हैं उनके साथ-साथ पहले कुछ और भी मगरमच्छ थे। लेकिन कालांतर में सिर्फ गंगाराम ही जीवित बचा। वे इस मगरमच्छ को गंगाराम कहकर पुकारते थे। उनके पुकारते ही मगरमच्छ तालाब के बाहर आ जाता था।

किसी के घर नहीं जला चूल्‍हा

किसी के घर नहीं जला चूल्‍हा

गांव के सरपंच ने बताया कि 'ग्रामीणों का मगरमच्छ से गहरा लगाव हो गया था। मगरमच्छ ने दो तीन बार करीब के अन्य गांव में जाने की कोशिश की थी लेकिन हर बार उसे वापस लाया जाता था। गंगाराम के प्रति ग्रामीणों का लगाव इस बात से मालूम चलता है कि गंगाराम की मौत के दिन गांव के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जला।'

500 लोग शामिल हुए गंगाराम की शवयात्रा में

500 लोग शामिल हुए गंगाराम की शवयात्रा में

गांव वालों का गंगाराम के प्रति लगाव देख कलेक्‍टर ने वनविभाग को तालाब किनारे ही पोस्‍टमार्टम करने को कहा, इसके बाद ग्रामीणों ने ढोल-मंजीरे के साथ गंगाराम की शवयात्रा निकाली और नम आंखों से तालाब के पास ही मगरमच्छ गंगाराम को दफना दिया। लगभग 500 ग्रामीण मगरमच्छ की शव यात्रा में शामिल हुए थे। गंगाराम के शव को सजा-धजाकर ट्रैक्टर पर शवयात्रा निकाली गई। गांव सरपंच ने बताया कि ग्रामीण गंगाराम का स्मारक बनाने की तैयारी कर रहे हैं और जल्द ही एक मंदिर बनाया जाएगा जहां लोग पूजा कर सकें।

Story first published: Friday, January 11, 2019, 13:20 [IST]
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