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Year Ender 2022: सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में दिए ऐतिहासिक फैसले
साल 2022 भारत की महिलाओं के लिए कुछ राहत भरी खबर के साथ जा रहा है। इस साल भारत के न्याय व्यावस्था में महिलाओं के लिए सकारात्मक फैसले लिए गये जो उनके लिए काफी अहम साबित हुए, जिनकी मांग महिलाएं काफी सालों से करती आ रही थी, अपना हक मांग रही थीं। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बेहतरी के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए। इस साल महिलाओं के लिए क्या क्या ऐतिहासिक फैसले लिए गये यहां पर बताया जा रहा है।

मेरिटल रेप भी रेप ही है
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 29 सितंबर को एतिहासिक फैमलें में कहा कि वैवाहिक बलात्कार भी रेप ही माना जाएगा। ये फैसला गर्भपात के उद्देश्य से पारित किया गया। इस अवलोकन ने देश भर में लाखों को एक सुकून दिया। आशा दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि पति द्वारा अपनी पत्नी पर किए गए सेक्सुअल असॉल्ट को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम के प्रावधानों के तहत रेप माना जाएगा। इसमें कहा गया है कि रेप की परिभाषा में एमटीपी एक्ट के तहत मेरिटल रेप भी शामिल होगा।

सेफ और लीगल अबॉर्शन हर महिला का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट के एक दूसरे ऐतिहासिक फैसले में, कहा कि महिलाओं को 20-24 सप्ताह के बीच भ्रूण का गर्भपात करने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि अबॉर्शन की अनुमति देने के लिए विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच अंतर करना असंवैधानिक है। 29 सितंबर को जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, ए एस बोपन्ना और जे बी पर्दीवाला की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला दिया। इस फैसले के अनुसार, एक महिला की वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव उसके समानता के अधिकार के खिलाफ है।
न्यायालय ने स्वास्थ्य मंत्रालय को मेडिकल स्कूलों में पाठ्यक्रम की समीक्षा करने का भी निर्देश दिया ताकि यौन उत्पीड़न और बलात्कार के उत्तरजीवियों की जांच करते समय अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं में से एक के रूप में टू-फिंगर टेस्ट निर्धारित न हो। शीर्ष अदालत तेलंगाना उच्च न्यायालय के एक फैसले के खिलाफ दायर एक अपील पर फैसला कर रही थी, जिसने बलात्कार के एक मामले में निचली अदालत द्वारा दर्ज की गई सजा को पलट दिया था।

घर बनाने के लिए पैसे मांगना दहेज माना जाएगा
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि बेटी को अपने माता-पिता से घर बनाने के लिए अपने ससुराल वालों को 'कर्ज' देने के लिए कहना दहेज माना जाएगा। कोर्ट दहेज हत्या से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इस फैसले पर आया।

बच्चे का सरनेम तय करने का अधिकार मां के पास
उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया कि एक मां के पास बच्चे का उपनाम तय करने का अधिकार है। मां नेचुरल गार्जियन है। कोर्ट ने ये भी कहा कि अपने पहले पति के निधन के बाद भी एक मां को अपने नए परिवार में बच्चे को शामिल करने और सरनेम तय करने से नहीं रोका जा सकता है।

महिला को बच्चे को गोद लेने का भी अधिकार
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस कृष्ण मुरारी ने कहा कि "महिला को बच्चे को गोद लेने का भी अधिकार है। हिंदू अल्पसंख्यक और दत्तक ग्रहण अधिनियम, 1956 की धारा 6 के तहत नाबालिग बच्चे के प्राकृतिक अभिभावक के रूप में मां को भी पिता के समान स्थान दिया।

टू-फिंगर टेस्ट पर रोक
31 अक्टूबर को, सुप्रीम कोर्ट ने रेप या यौन हमले के सर्वाइवर पर 'टू-फिंगर टेस्ट' के प्रेक्टिस पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसमें कहा गया था कि टेस्ट करने वाला कोई भी व्यक्ति मिसकन्डक्ट का दोषी होगा और उसके अनुसार निपटा जाएगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि टेस्ट रिग्रेसिव है और इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है क्योंकि यह न तो रेप के आरोपों को साबित करता है और न ही खारिज करता है। इसके विपरीत, यह 'उन महिलाओं को फिर से प्रताड़ित और दोबारा आघात पहुंचाता है जिनका यौन उत्पीड़न किया गया हो।



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