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Mahakumbh 2025 : संगम किनारे 300 साल पुराना अक्षयवट, इसके दर्शन बिना अधूरी है महाकुंभ की यात्रा
Significance and History of 300-Year-Old Akshayvat Tree : महाकुंभ 2025 श्रद्धालुओं के लिए विशेष होने वाला है, क्योंकि पहली बार अक्षय वट के दर्शन कॉरिडोर के जरिए संभव होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में अक्षय वट कॉरिडोर का उद्घाटन किया गया, जिसके बाद इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया। त्रिवेणी संगम गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम के तट पर स्थित यह 300 साल पुराना वटवृक्ष धार्मिक आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि अक्षय वट के दर्शन से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। महाकुंभ से पहले ही हजारों श्रद्धालु रोज लंबी कतारों में लगकर इस दिव्य स्थल के दर्शन कर रहे हैं। यह श्रद्धा और परंपरा का प्रतीक है।
तीर्थराज प्रयाग, जहां 33 कोटि देवी-देवताओं का वास माना जाता है, महाकुंभ के दौरान विशेष महत्व रखता है। संगम स्नान को अत्यधिक फलदायी कहा गया है, लेकिन यह तभी पूर्ण माना जाता है जब श्रद्धालु त्रिवेणी स्नान के बाद अक्षय वट के दर्शन करते हैं।

सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षा कारणों से किले के अंदर स्थित अक्षय वट का दर्शन आम श्रद्धालुओं के लिए वर्जित था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से अक्षय वट अब कॉरिडोर के जरिए सुलभ हो गया है। महाकुंभ 2025 में करोड़ों श्रद्धालु बिना किसी कठिनाई के इस पवित्र वटवृक्ष का दर्शन कर सकेंगे, जो मोक्ष प्राप्ति और आध्यात्मिक शांति का प्रतीक माना जाता है।
पुराणों में भी है वटवृक्ष का इतिहास
त्रिवेणी संगम के तट पर स्थित अक्षय वट का उल्लेख पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। यह वटवृक्ष धार्मिक आस्था और पौराणिक मान्यताओं का प्रतीक है। मान्यता है कि अक्षय वट के दर्शन से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। साथ ही, संगम स्नान का पूर्ण लाभ तभी मिलता है जब स्नान के बाद अक्षय वट के दर्शन किए जाएं। यही कारण है कि देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु महाकुंभ के दौरान संगम स्नान के बाद अक्षय वट के दर्शन के लिए कतारों में लगते हैं। यह वटवृक्ष केवल आध्यात्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि मोक्ष प्राप्ति का माध्यम भी माना जाता है।
मुगलों ने दर्शन पर लगाई थी रोक
अक्षय वट के महत्व का जिक्र धार्मिक ग्रंथों में विशेष रूप से किया गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने माता सीता के साथ वनवास के दौरान तीन रातें अक्षय वट के नीचे बिताईं। ग्रंथों में यह बताया गया है कि जब प्रलयकाल आएगा और पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी, तब भी अक्षय वट हमेशा हरा-भरा रहेगा। उन्होंने यह भी बताया कि कई बार मुगलों ने इस वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास किया, लेकिन अक्षय वट पर कभी कोई असर नहीं पड़ा। यमुना तट पर अकबर के किले में स्थित अक्षय वट के दर्शन पर मुगलकाल में प्रतिबंध था। ब्रिटिश काल और आजाद भारत में भी किला सेना के नियंत्रण में होने के कारण इस वृक्ष का दर्शन दुर्लभ था।
महाकुंभ के स्नान पर्व के दौरान नहीं होंगे दर्शन
महाकुंभ से पहले अक्षय वट के दर्शन के खुलने से श्रद्धालुओं में खुशी की लहर है। श्रद्धालु यह मानते हैं कि अब उन्हें संगम स्नान का पूर्ण लाभ मिलेगा। अपर मेला अधिकारी विवेक चतुर्वेदी के अनुसार, अक्षय वट कॉरिडोर को आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया है और अब वे सुबह 6:30 बजे से शाम 6:30 बजे तक इसके दर्शन कर सकेंगे। हालांकि, महाकुंभ के पीक स्नान पर्व के दौरान सुरक्षा कारणों से अक्षय वट के दर्शन पर रोक रहेगी। उस समय आम श्रद्धालु दर्शन नहीं कर पाएंगे, लेकिन महाकुंभ के सामान्य दिनों में वे इसका लाभ उठा सकेंगे।



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