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डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर को बाबासाहेब के नाम से भी जाना जाता है। बाबासाहेब दलितों की चिंताओं को सशक्त बनाने और आवाज उठाने और उनके अधिकारों के लिए लड़ने के लिए जाने जाते हैं। उनके कई योगदानों के लिए उन्हें याद किया जाता है। खासकर नए स्वतंत्र भारत के लिए एक संविधान तैयार करने वाली मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में। इतना ही नहीं उन्हें भारतीय संविधान का जनक भी कहा जाता है। 1990 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था। बाबासाहेब 9 भाषाओं को जानते थे। उन्हें डॉक्टरेट की पढ़ाई करने वाले भारत के पहले व्यक्ति के रूप में भी जाना जाता है। हर सार बाबासाहेब की पुण्यतिथि आज के दिन महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है। आइए जानते हैं इसे मनाने का कारण और महत्व के बारे में।
महापरिनिर्वाण दिवस का महत्व
आज का दिन भारत में डॉ भीमराव अम्बेडकर के लाइफ, करियर, कामों और योगदान को याद करने के लिए है। भारतीय संविधान के मुख्य निर्माणकर्ता के रूप में भी उन्हें आज के दिन याद किया जाता है। आज बाबासाहेब के जीवन के हर पहलू को याद किया जाता है। डॉ भीमराव अंबेडकर भारतीय इतिहास में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। ऐसे में आज का दिन उन्हें एक समाज सुधारक के रूप में जीवीत रखता है। दलितों की स्थिति में सुधार लाने, छूआछूत जैसी प्रथा को खत्म करने जैसे बड़े समाज सुधारक काम उन्हें ने अपने जीवन में किए हैं। बाबासाहेब के अनुयायियों का मानना है कि उनके गुरु भगवान बुद्ध की तरह ही काफी प्रभावी और सदाचारी थे।
महापरिनिर्वाण दिवस का इतिहास
6 दिसंबर 1956 को डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर का निधन हो गया। तब से हर साल आज के दिन को महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है। 'परिनिर्वाण' बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांतों में से एक है। जो 'मृत्यु के बाद निर्वाण' के रूप में अनुवादित है। बौद्ध ग्रंथ के मुताबिक 80 साल की उम्र में भगवान बुद्ध की मृत्यु को महापरिनिर्वाण माना जाता है। जबकि उनका जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था, लेकिन भीमराव अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को अपना लिया था। जिसके कारण उनकी पुण्यतिथि को महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है।
कैसे मनाते हैं महापरिनिर्वाण दिवस
समाज सुधारक और संविधान निर्माता डॉ भीमराव अम्बेडकर की पुण्यतिथि के दिन उनकी प्रतिमा पर फूल-माला आर्पित किया जाता है। उनकी प्रतिमा के सामने दीपक और मोमबत्तियां जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। बाबासाहेब को श्रद्धांजलि देने के लिए चैत्य भूमि पर भी बड़ी मात्रा में लोग इकट्ठा होते हैं। बौद्ध भिक्षु पवित्र गीत गाकर उन्हें याद करते हैं।



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