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Mahavatar Narsimha: इस मंदिर में है भगवान नृसिंह की 'जिंदा मूर्ति', भक्तों को सुनाई देती है सांसों की आवाज
Mysterious Temple Of Narsimha : 25 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म 'महावतार नरसिम्हा' इन दिनों धार्मिक और सिनेमा प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। इस फिल्म में भगवान विष्णु के चौथे और सबसे प्रचंड अवतार नृसिंह की कथा को बेहद रोमांचक और तकनीकी रूप से उन्नत अंदाज में प्रस्तुत किया गया है।
निर्देशक अश्विन कुमार द्वारा निर्देशित यह फिल्म न सिर्फ धर्मप्रेमियों को लुभा रही है, बल्कि भगवान नृसिंह के अद्भुत रूप की भव्य झलक भी दिखा रही है। इसी कड़ी में आज हम आपको भगवान नृसिंह से जुड़े एक ऐसे प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था और चमत्कार का केंद्र माना जाता है। माना जाता है कि ये मंदिर में भगवान नृसिंह की जीवित प्रतिमा है।

4000 साल पुराना चमत्कारी मंदिर
तेलंगाना के मल्लूर गांव के हेमाचल लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर समुद्र तल से लगभग 1500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर पुट्टकोंडा नामक पहाड़ी पर स्थित है। मान्यता है कि यहां भगवान नरसिंह की मूर्ति स्वयंभू है यानी यह किसी मानव द्वारा बनाई गई नहीं है बल्कि स्वयं धरती से प्रकट हुई है। श्रद्धालु बताते हैं कि यह मूर्ति आम पत्थर या धातु की नहीं है, बल्कि एक जीवित शरीर जैसी प्रतीत होती है।
मूर्ति जो सांस लेती है और रक्त स्राव करती है
मंदिर में भगवान नरसिंह की मूर्ति 10 फीट ऊंची है। भक्तों और मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, इस मूर्ति की त्वचा इंसान जैसी है, इतनी मुलायम कि जब कोई उस पर हाथ रखता है या फूल रखता है, तो वह दब जाती है। कुछ घटनाओं में तो मूर्ति से रक्त जैसी तरल चीज निकलते हुए देखी गई है। मूर्ति के नाभि से भी एक प्रकार का रक्त जैसा द्रव लगातार निकलता रहता है, जिसे नियंत्रित करने के लिए पुजारी रोज उस पर चंदन का लेप करते हैं।
मूर्ति में है दिव्य ऊर्जा का वास
भक्तों का मानना है कि इस मूर्ति में भगवान नरसिंह का दिव्य रूप मौजूद है। जो भी सच्चे मन से इस मंदिर में दर्शन करता है, उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विशेषकर, संतान सुख की कामना करने वाले दंपत्तियों को यहां भगवान का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए चढ़नी पड़ती हैं 150 सीढ़ियां
इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 150 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। यह रास्ता भक्तों की आस्था और दृढ़ निश्चय का प्रतीक बन जाता है। रास्ते में भगवान हनुमान 'शिखांजनेय' रूप में विराजमान हैं, जो इस क्षेत्र के रक्षक देवता माने जाते हैं।
पौराणिक जलधारा "चिंतामणि जलपथम"
मंदिर के पास बहने वाली जलधारा को भगवान नरसिंह के चरणों से उत्पन्न माना जाता है। इसका नाम "चिंतामणि जलपथम" है, जो कि रानी रुद्रम्मा देवी द्वारा दिया गया था। यह जलधारा पवित्र मानी जाती है और इसमें औषधीय गुण भी माने जाते हैं। श्रद्धालु इस जल में स्नान करते हैं या बोतलों में भरकर अपने घर ले जाते हैं।
अद्भुत वास्तुकला और ब्रह्मोत्सवम उत्सव
मंदिर की वास्तुकला विशुद्ध रूप से दक्षिण भारतीय शैली में बनी है। गोपुरम शैली का मुख्य द्वार और दीवारों पर की गई देवी-देवताओं की जटिल नक्काशी मंदिर की भव्यता को दर्शाती है। हर साल यहां ब्रह्मोत्सवम नामक भव्य उत्सव मनाया जाता है जिसमें भगवान की मूर्ति को विशेष शोभायात्रा में ले जाया जाता है। इसमें दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होते हैं।
मंदिर दर्शन का समय
यह मंदिर सुबह 8:30 बजे से 1:00 बजे तक और फिर 2:30 बजे से 5:30 बजे तक खुला रहता है। शाम 5:30 बजे के बाद मंदिर बंद कर दिया जाता है, क्योंकि मान्यता है कि इसके बाद भगवान नरसिंह विश्राम करते हैं।



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