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Muharram 2026: मुहर्रम क्यों मनाया जाता है? जानें कर्बला की जंग और इमाम हुसैन की शहादत का इतिहास
Muharram 2026: मुहर्रम इस्लामी हिजरी कैलेंडर का पहला महीना होता है। इस साल भारत में मुहर्रम महीने की शुरुआत 17 जून से हुई है। यह महीना मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद अहम माना जाता है। मुहर्रम की 10वीं तारीख को आशूरा कहा जाता है, जो हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में मनाई जाती है। इसी वजह से इस दौरान लोग कर्बला की ऐतिहासिक घटना को याद करते हैं और शोक व्यक्त करते हैं। हालांकि, कर्बला की जंग के बारे में बहुत से लोग विस्तार से नहीं जानते। आइए, जानते हैं कि आखिर कर्बला के मैदान में क्या हुआ था और यह घटना इतिहास में इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जाती है -

मुहर्रम क्यों मनाया जाता है?
मुहर्रम का महीना मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद खास माना जाता है। यह महीना त्याग और बलिदान की याद दिलाता है। मुहर्रम, बकरीद के 20 दिन बाद मनाया जाता है। इस महीने की 10वीं तारीख, जिसे आशूरा कहा जाता है, का विशेष महत्व है। इसी दिन कर्बला की ऐतिहासिक घटना हुई थी, जिसमें हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। हजरत इमाम हुसैन इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे थे। उनकी शहादत की याद में दुनिया भर के मुसलमानमातम मनाते हैं। इस दौरान लोग इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद करते हैं, मजलिसों में शामिल होते हैं और कई जगहों पर ताजिए तथा जुलूस निकाले जाते हैं।
कर्बला की जंग में क्या हुआ था?
कर्बला की घटना वर्ष 680 ईस्वी (61 हिजरी) में वर्तमान इराक के कर्बला शहर में हुई थी। उस समय यजीद सत्ता पर था और वह चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसकी बैअत (निष्ठा) स्वीकार कर लें। लेकिन इमाम हुसैन ने अन्याय और अत्याचार के सामने झुकने से इनकार कर दिया। इसके बाद इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ मक्का से कूफा की ओर रवाना हुए। रास्ते में कर्बला के मैदान में यजीद की सेना ने उन्हें घेर लिया। इतिहास के अनुसार, इमाम हुसैन के साथ उनके परिवार के सदस्य और कुछ साथी मिलाकर लगभग 72 लोग थे, जबकि सामने हजारों सैनिकों की सेना थी। कर्बला में कई दिनों तक इमाम हुसैन के काफिले को पानी से भी वंचित रखा गया। इसके बावजूद उन्होंने यजीद की बैअत स्वीकार नहीं की। आखिरकार 10 मुहर्रम को दोनों पक्षों के बीच युद्ध हुआ। इस लड़ाई में इमाम हुसैन के लगभग सभी साथी और परिवार के कई सदस्य शहीद हो गए।
इमाम हुसैन की शहादत का महत्व
कर्बला की जंग केवल सत्ता की लड़ाई नहीं थी, बल्कि इसे सत्य, न्याय और इंसाफ के लिए दी गई कुर्बानी के रूप में देखा जाता है। इमाम हुसैन ने अन्याय के सामने समझौता करने के बजाय शहादत को चुना। यही वजह है कि आज भी मुहर्रम के दौरान उनकी कुर्बानी को याद किया जाता है। आशूरा के दिन लोग इमाम हुसैन, उनके परिवार और साथियों की शहादत को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं और उनके बताए गए सत्य तथा इंसाफ के रास्ते पर चलने का संदेश लेते हैं।



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