Latest Updates
-
Varalakshmi Vrat Katha: वरलक्ष्मी व्रत के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, धन से जुड़ी बाधाएं होंगी दूर -
Varalakshmi Vrat 2026 Wishes: मां लक्ष्मी का आशीर्वाद...वरलक्ष्मी व्रत पर प्रियजनों को भेजें ये शुभकामना संदेश -
Rakhi Gift Ideas For Sister: इस रक्षाबंधन बहन को दें ये 7 प्यार भरे तोहफे, देखते ही खुशी से झूम उठेगी -
World Mosquito Day 2026: मच्छरों के काटने से हो सकती हैं ये खतरनाक बीमारियां, बचाव के लिए अपनाएं ये घरेलू उपाय -
पुरूषों को स्पर्म काउंट बढ़ाने के लिए खानी चाहिए ये 7 चीजें, फर्टिलिटी में होगा सुधार -
घर में अचानक कॉकरोच निकलना शुभ या अशुभ? जानें ज्योतिष और वास्तु के संकेत -
40 की उम्र में भी नजर आएंगी 20 की, हेल्दी और ग्लोइंग स्किन के लिए डाइट में शामिल करें ये 7 फूड्स -
September Travel Destinations: सितंबर में घूमने के लिए बेस्ट हैं ये भारत की ये 7 खूबसूरत जगहें, मिलेगा यादगार -
World Photography Day 2026: क्यों मनाया जाता है विश्व फोटोग्राफी दिवस? जानें इस दिन का इतिहास, महत्व और थीम -
5 साल से तालाब में रह रहे इकबाल की मदद के लिए आगे आए अनंत अंबानी, इलाज के लिए मुंबई एयरलिफ्ट कराया
डॉक्टर्स डे 2023: क्या आप जानते हैं महात्मा गाँधी के इस चिकित्सक के नाम पर मनाया जाता है 'डॉक्टर्स डे'
राजनीति में बहुत कम ही लोग अपनी अनूठी पहचान बना पाते हैं, जो सच में जननेता कहला पाएं और जन सेवा में अपना जीवन लगा दें। ऐसे ही भारतीय राजनीति के एक नेता थे - बिधान चंद्र रॉय जो राजनीति की दुनिया में एक अपवाद बनें और ना केवल एक नेता के तौर पर बल्कि चिकित्सक, संपादक और मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी भूमिकाओं का निर्वहन किया।
1 जुलाई, 1882 को जन्मे बिधान चंद्र रॉय 20वीं सदी के भारत के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक थे। उनकी जयंती, जो संयोगवश उनकी मृत्युतिथि (1962 में मृत्यु) भी है, नेशनल डॉक्टर्स दिवस के रूप में मनाई जाती है।

आम लोगों के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उन्होंने देश में दो प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों - 1928 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जानते हैं महात्मा गांधी के चिकित्सक रहें और मुख्यमंत्री के 1950 के दशक में खराब स्थिति में चल रहे पश्चिम बंगाल की बागडोर संभालने वाले बिधान चन्द्र रॉय के शानदार और प्रेरक जीवन के बारे में विस्तार से -
शुरुआती जीवन और मेडिकल करियर
गणित में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, बीसी रॉय ने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा का अध्ययन किया। लेकिन वह विदेश में अध्ययन करना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने इंग्लैंड में सेंट बार्थोलोम्यू में डीन के पास प्रवेश के लिए 29 आवेदन भेजे थे, जिसके बाद अंततः उनका आवेदन स्वीकार हुआ।
उन्होंने आर.जी. कार मेडिकल कॉलेज में मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख का पद संभाला और बाद में अपने जीवन के अंतिम दिन तक मेडिसिन और परामर्श चिकित्सक के एमेरिटस प्रोफेसर रहे। वह मेडिकल एजुकेशन सोसाइटी ऑफ बंगाल (आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की गवर्निंग बॉडी) के अध्यक्ष भी थे। वह लगभग 44 वर्षों तक आर. जी. कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल, कलकत्ता से जुड़े रहे। उन्होंने देश में जन स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार लाने के लिए कई मेडिकल संस्थानों की भी नींव रखी।
राजनीति में प्रवेश
डॉ. रॉय अपने जीवन में बहुत पहले ही राजनीति में आ गए थे और 1923 में एक युवा डॉक्टर के रूप में उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास की स्वराज्य पार्टी द्वारा समर्थित एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा और चुनावों में अनुभवी राष्ट्रवादी नेता को नाटकीय रूप से हराया। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में भी प्रभावशाली योगदान दिया। वे आगे चलकर कांग्रेस कार्य समिति के भी सदस्य बनें।

महात्मा गांधी के साथ थे घनिष्ठ सम्बन्ध
महात्मा गांधी ने एक बार अपने चिकित्सक डॉ. रॉय से प्रश्न किया: "मुझे आपसे इलाज क्यों कराना चाहिए? क्या आप मेरे चार सौ करोड़ देशवासियों का भी मुफ्त इलाज कर सकते हैं?" रॉय ने जवाब देते हुए कहा, "नहीं गांधीजी, मैं सभी मरीजों का मुफ्त इलाज नहीं कर सकता। लेकिन यहां, मैं मोहनदास करमचंद गांधी का इलाज करने नहीं बल्कि उनका इलाज करने आया हूं जो मेरे देश के चार सौ करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।''
बीसी रॉय उन कुछ नेताओं में से एक थे जिन पर जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल भरोसा करते थे। आजादी के बाद कांग्रेस उन्हें बंगाल का मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी। लेकिन बीसी रॉय इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। वह डॉक्टर ही बने रहना चाहते थे। लेकिन 1948 में महात्मा गांधी के आग्रह करने पर डॉ.रॉय ने मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव स्वीकार किया। वर्ष 1962 तक वे बंगाल के मुख्यमंत्री रहें।
संपादक की भी निभाई भूमिका
चिकित्सा, सार्वजनिक जीवन और राजनीति से परे, डॉ. रॉय एक पत्रकार भी थे। उन्होंने चितरंजन दास द्वारा शुरू की गई पत्रिकाओं "फॉरवर्ड", "बंगबासी" और "आत्मशक्ति" का संपादन किया। उन्होंने "लिबर्टी" का संपादन भी किया और यूनाइटेड प्रेस ऑफ इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष थे।
डॉ. रॉय को 1961 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। वह अपने अंतिम दिन तक एक डॉक्टर और बंगाल के मुख्यमंत्री दोनों के रूप में काम करते रहे। उन्होंने नर्सिंग होम चलाने के उद्देश्य के लिए कलकत्ता स्थित अपना घर दान में दिया था। जीवन भर उनके प्रभावशाली और प्रेरक कामों और स्वार्थहीन कार्यों को सम्मान देने के उद्देश्य से ही उनकी जयंती के अवसर पर देश भर में नेशनल डॉक्टर्स डे मनाया जाता है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



Click it and Unblock the Notifications