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बंटवारे में पाकिस्तान से अलवर पहुंचा था कलाकंद, अटलबिहारी वाजपेय भी थे इसके स्वाद के मुरीद
हमारे देश में एक से बढ़कर एक मिठाई है, जो हमारे खानपान का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। इनमें से कुछ ने भारत में ही जन्म लिया तो कुछ बाहरी संस्कृति की देन है।
इन्हीं मिठाईयों में से एक ऐसी वर्ल्ड फेमस मिठाई है, जिसका जन्म तो पाकिस्तान में हुआ था लेकिन नाम उसे भारत में आकर मिला।
भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की वजह से ये मिठाई भारत पहुंची और यहीं की होकर रह गई। हम बात कर रहें है अलवर के प्रसिद्ध कलाकंद की, जिसे विदेशों में मिल्ककेक के नाम से पुकारा जाता है। आइए जानते हैं इसके दिलचस्प सफर के बारे में

रोचक है कलाकंद बनने की कहानी
आजादी से पहले पाकिस्तान में बाबा ठाकुर दास के हाथ से दूध फट गया था। तब बतौर हलवाई उन्होंने एक प्रयोग किया। दूध को फेंकने की बजाय इसमें चीनी मिलाकर ओटाने लगे। दूध से पानी खत्म होने के बाद इसे ठंडा करने के लिए खोमचे में रख दिया। जब इसे चखकर देखा तो स्वाद बेहतरीन लगा। ग्राहकों ने भी इसे काफी पसंद किया। आजादी के बाद बाबा ठाकुरदास का परिवार अलवर आकर बस गया। यहां छोटी सी दुकान खोली और कलाकंद बनाना शुरू किया। अभिषेक बाबा ठाकुरदास की तीसरी पीढ़ी से हैं। अलवर में आज उनके 5 स्टॉल हैं, यहां लगी भट्टियों में दिन रात कलाकंद तैयार होता है।

अटल बिहारी वाजपेयी को पसंद था अलवर का कलाकंद
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब भी सड़क मार्ग से जयपुर आते या जाते थे, तो बीच में एक जगह उनका काफिला जरूर रुकता था। ये जगह होती थी अलवर और रुकने की वजह होती दूध से बनी स्पेशल मिठाई कलाकंद। इस मिठाई को पसंद करने वालों की लिस्ट काफी लंबी है। देश-विदेश में कलाकंद को मिल्क केक के नाम से जाना जाता है।
ऐसे बनता है कलाकंद
करीब 4 किलो दूध में 1 किलो मिल्क केक तैयार होता है। दूध को गर्म कर उसका छेना ( फाड़ा ) तैयार किया जाता है। फिर उसमें स्वाद के अनुसार चीनी मिलाई जाती है। केसर डालकर सांचे में जमाया जाता है। फिर इसमें ड्राई फ्रूट डाले जाते हैं। -

अजमेर का मेंगो कलाकंद भी है फेमस
जहां अलवर के कलाकंद ने पूरी दुनिया में अपने अनूठे स्वाद के वजह से धाक जमा रखी है। वहीं अजमेर का मेंगो कलाकंद भी कम नहीं है। करीब 58 साल पहले अजमेर में एक हलवाई ने प्रयोग किया और एक लाजावाब स्वाद बन गया है। इस कलाकंद की खासियत ये है कि इसे खास महंगे आमों से बनाया जाता है। जिसे पहचानने का हुनूर इन हलवाइयों के पास ही है। मेंगों कलाकंद बनाने के लिए GI टैगिंग वाले महाराष्ट्र के देवगढ़ के हापुस आम जिसे अल्फांसो भी कहते हैं, इन्हीं से इन्हें बनाया जाता है।



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