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Kasuri methi: कभी घोड़ों का चारा हुआ करती थी, अब इसके स्वाद का पूरी दुनिया में बजता है डंका
The Origin of Kasuri Methi : खाने को जायकेदार और खुश्बूदार बनाने के लिए तकरीबन हर घर में कसूरी मेथी का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी खास तरह की खुशबू ही हर तरह की सब्जी का जायका बदल देती है। यही वजह है कि नागौर में उगने वाली यह हरी सूखी पत्तियां आज देश ही नहीं विदेशों में भी खाने के शौकीनों को मुरीद कर चुकी है। आइए जानते हैं कसूरी मेथी का इतिहास।
पाकिस्तान आई कसूरी मेथी
कसूरी शब्द पाकिस्तान के कसूर प्रांत से आया है, जहां इसकी खेती की जाती है। शेफ कुणाल ने बताया कि कसूरी मेथी का नाम पाकिस्तान के कसूर से आया है, जहां मूल रूप से इसकी खेती की जाती है। कसूर में इस मेथी की खेती होने की वजह से ही इसका नाम कसूरी मेथी पड़ा।

देश में एकमात्र नागौर में ही होती है खेती
देश में सिर्फ नागौर में ही कसूरी नाम से फेमस मेथी की खेती की जाती है। कुछ दूसरी जगहों पर भी इसकी खेती होती है, लेकिन ऐसा अरोमा और टेस्ट वहां मेथी में नहीं आ पाया। कृषि वैज्ञानिक इसके लिए केवल नागौर की जलवायु और मिट्टी को ही अनुकूल मानते हैं।
सैकड़ों साल पहले हुई शुरुआत
नागौर में सैकड़ों सालों से मेथी की खेती की जा रही है। पहले इसे घोड़ों के चारे के तौर पर उगाया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसकी खुशबू ने लोगों को आकर्षित किया। घरों में लोग उपयोग करने लगे। फिर यह लोकल बाजार तक पहुंची, लेकिन आजादी से कुछ साल पहले एमडीएच कंपनी के धर्मपाल गुलाटी ने इसे पहचाना और फिर यहां के किसानों से खरीदना शुरू किया, बाद में उन्होंने खुद की कंपनी एमडीएच की प्रोसेसिंग यूनिट यहां लगाई। इसके बाद यह जायका देश के कोने-कोने तक पहुंचने लगा।



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