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लाल बहादुर शास्त्री के जीवन के वो रोचक 8 किस्सें, जिन्हें सुनकर आपको भी होगा गर्व
Lal Bahadur Shastri jayanti Facts : महात्मा गांधी और देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म एक ही दिन हुआ था और 2 अक्टूबर को दोनों की जयंती मनाई जाती है। लाल बहादुर शास्त्री का जन्म काशी के रामनगर में टीचर रहे मुंशी शारदा प्रसाद के घर 2 अक्टूबर 1904 को हुआ था।
सादा जीवन उच्च विचार वाले शास्त्री जी साल 1920 में शास्त्री जी भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए थे और स्वाधीनता संग्राम के जिन आंदोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें मुख्य रूप से 1921 का असहयोग आंदोलन, 1930 का दांडी मार्च और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उल्लेखनीय हैं।
शास्त्री ने ही देश को 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया था। आजादी के बाद वे 1951 में नई दिल्ली आ गए और केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला। वह रेल मंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, गृह मंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री भी रहे। आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़े रोचक पहलूओं के बारे में-

तैरकर जाते थे स्कूल
बचपन में ही पिता की मौत होने के कारण वे अपनी मां के साथ नाना के यहां मिर्जापुर चले गए। पिता की मौत होने से पूरी जिम्मेदारी मां रामदुलारी पर आ गई। गरीबी में कर्ज लेकर मां ने शास्त्री जी की पढ़ाई करवाई। शास्त्री जी बचपन में पढ़ाई के लिए निकलते थे तो रोज गंगा नदी तैरकर पार किया करते थे। सिर पर बस्ता और कपड़ा रख शास्त्री जी कई किलोमीटर लंबी मां गंगा को आसानी से पार किया करते थे। स्कूल में स्कॉलर होने की वजह से बचपन में उन्हें तीन रुपए स्कॉलरशिप भी मिलती थी।
उपाधि को बना दिया उपनाम
लाल बहादुर शास्त्री का असली नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। भारत में गहरी जड़ें जमाने वाली जाति-व्यवस्था का विरोध करते हुए, 12 वर्ष की आयु में, 1917 में, उन्होंने अपना उपनाम 'श्रीवास्तव' छोड़ दिया। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्हें 'शास्त्री' की उपाधि दी गई, जिसका अर्थ है विद्वान। इसे ही बना दिया अपना उपनाम।
वीवीआईपी नहीं आम आदमी की तरह करते थे भोजन
1952 में लाल बहादुर शास्त्री रेल मंत्री बने। उस दौरान का एक वाकया है कि रेल मंत्री रहते हुए काशी आगमन पर जनता का संबोधन था। शास्त्री जी कार्यक्रम में वीवीआईपी की तरह नहीं बल्कि आम आदमी की तरह दोपहर के खाने में अक्सर वो साग-रोटी खाया। कार्यक्रम आयोजक तरह-तरह के पकवान उनके लिए बनवाकर लाएं। शास्त्री जी ने आयोजकों को डांटाऔर समझाया। गरीब आदमी भूखा सोया होगा और मै मंत्री बन पकवान खाऊं, शोभा नहीं देता।
जब बेटे ने चलाई सरकारी कार, तो लगा दी फटकार
शास्त्री जी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें आधिकारिक उपयोग के लिए शेवरले इम्पाला कार मिली। उनके बेटे सुनील शास्त्री एक बार सरकारी कार से कॉलेज चले गए थे। उन्होंने ड्राइवर और बेटे को फटकार लगाई थी कि घर की नहीं भारत सरकार की कार जनता की सेवा के लिए है। उन्होंने ड्राइवर से कहा कि कार का इस्तेमाल निजी इस्तेमाल के लिए कितनी दूरी पर किया गया और बाद में सरकारी खाते में तनख्वाह से साढ़े चार रुपए ईंधन का जमा कर दिया।
अकाल में संभाले हालात
भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश में अन्न की कमी हो गई। देश भुखमरी की समस्या से गुजरने लगा था। अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने के लिए कहा था की भारत युद्ध खत्म कर दे नहीं तो अमेरिका भारत को खाने के लिए गेहू देना बंद कर देगा तो इसके जवाब मे शास्त्री जी ने कहा की हम स्वाभिमान से भूखे रहना पसंद करेंगे किसी के सामने भीख मांगने की जगह। और शास्त्री जी देशवासियों से निवेदन किया की जब तक अनाज की व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक सब लोग सोमवार का व्रत रखना चालू कर दे और खाना कम खाया करे। उनकी अपील को अच्छी प्रतिक्रिया मिली और सोमवार शाम को भोजनालयों ने शटर बंद कर दिए और जल्द ही लोगों ने इसे 'शास्त्री व्रत' कहना शुरू कर दिया। ना के जवानों और किसानों महत्व बताने के लिए उन्होंने 'जय जवान जय किसान' का नारा भी दिया।
बैंक से कर्जा लेकर खरीदी पहली कार
जब वे प्रधानमंत्री थे, तो उनके परिवार ने उन्हें एक कार खरीदने के लिए कहा था। उन्होंने जो फिएट कार खरीदी वह 12,000 रुपये में थी। चूंकि उनके बैंक खाते में केवल 7,000 रुपये थे, इसलिए उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 5,000 रुपये के बैंक ऋण के लिए आवेदन किया। कार को आज नई दिल्ली के शास्त्री मेमोरियल में रखा गया है।
जब खुद को बताया सरकारी कर्मचारी
प्रधानमंत्री होने के बावजूद शास्त्री जी ने अपने बेटे के कॉलेज एडमिशन फॉर्म में अपने आपको प्रधानमंत्री न लिखकर गवर्मेंट सर्वेंट लिखा। उन्होंने कभी भी अपने निजी जीवन या परिवार के लिए अपने पद का इस्तेमाल नहीं किया। उनके बेटे ने एक आम आदमी के बेटे की तरह खुद को इंप्लॉयमेंट एक्सचेंज में जॉब के लिए रजिस्टर करवाया था। यहां तक कि एक बार जब उनके बेटे को गलत तरह से प्रमोशन दे दिया गया तो शास्त्री जी ने खुद उस प्रमोशन को रद्द करवा दिया।
रहस्यमयी तरीके से हुई मौत
11 जनवरी 1966 को उज्बेकिस्तान के ताशकंद में उनकी मौत हो गई थी। साल 1965 के युद्ध के बाद वह पाकिस्तान से वार्ता करने के लिए वहां गए हुए थे। बैठक में भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने युद्ध समाप्त करने के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 11 जनवरी 1966 की ही रात को संदिग्ध परिस्थितियों में शास्त्री जी की मौत हो गई थी। उनकी मौत कैसे हुई, यह 49 साल के बाद आज भी राज है। मेडिकल रिपोर्ट में कहा गया है कि शास्त्रीजी की मौत हार्ट अटैक के चलते हुई, लेकिन उनकी पत्नी का आरोप था कि उन्हें जहर दिया गया था। कहा जाता है कि लालबहादुर शास्त्री की मौत के बाद उनका शरीर नीला पड़ गया था। इससे इस बात को तूल मिला कि उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने से नहीं, बल्कि जहर से ही हुई थी।



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