कभी क्रिकेटर बनना चाहती थी मनु भाकर, अब पेरिस ओलंपिक में एयर पिस्टल में ब्रॉन्ज जीत रचा इति‍हास

Paris Olympics 2024 से एक खुशखबरी सुनने को मिल रही हैं। जहां भारत की मनु भाकर महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल के फाइनल्स में पहुंच में ब्रॉन्ज मेडल जीता हैं। वह ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला भी बन गई हैं।

आपको बता दें कि टोक्यो ओलिंपिक 2020 में महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल इवेंट के फाइनल में नहीं पहुंच सकीं थीं। ऐन मौके पर पिस्तल में आई तकनीकी खराबी के वजह से वो फाइनल में जगह बनाने से चूक गई थी। लेकिन इस ओलंपिक में फाइनल में पहुंचकर देश के ल‍िए मेडल जीत उन्‍होंने देश का नाम रोशन क‍िया हैं। अब हर कोई ये जानना चाह रहा है कि आखिर ये मनु भाकर कौन है? आइए जानते देश के ल‍िए मेडल जीतने वाली इस धाकड़ ख‍िलाड़ी के बारे में-

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शूटिंग के अलावा अन्य खेलों में भी मनु की रुचि

25 साल की मनु भाकर हरियाणा के झज्जर के गांव गोरिया की रहने वाली हैं। पिता राम किशन भाकर मर्चेंट नेवी में वर्किंग हैं। शूटिंग से पहले मनु खुद को कराटे, थांग टा, टांता, स्केटिंग, स्वीमिंग और टेनिस में आजमा चुकी हैं। कराटे, थांग टा और टांता में मनु नेशनल मेडलिस्ट है। टांता में 3 बार की नेशनल चैंपियन है। स्केटिंग में स्टेट मेडल जीता। स्कूल में स्वीमिंग और टेनिस खेला।

क्रिकेटर बनने के लिए वीरेंद्र सहवाग की एकेडमी भी ज्‍वाइन की

एक समय था जब मनु भाकर क्रिकेट में करियर बनाना चाहती थी। क्रिकेट में करियर बनाने के लिए उन्‍होंने झज्‍जर स्थि‍त भारत के पूर्व सलामी बल्‍लेबाज वीरेंद्र सहवाग की एकेडमी भी ज्‍वाइन की थी। जहां उन्‍होंने कुछ समय तक क्रिकेट की ट्रेनिंग ली। लेकिन इसके बाद वह पिस्‍टल शूटिंग में आ गई है और इसमें ही आगे बढती चली गई।

ऐसी बनी पिस्टल शूटर

एक दिन मनु भाकर अपने पिता के साथ शूटिंग रेज में घूमने गई थी। जहां शूटिंग की और बिल्कुल बीच में 10 नंबर टार्गेट पर निशाना लगा दिया। यह देख पिता राम किशन ने मनु का हौसला बढ़ाया और मनु को नेशनल कोच यशपाल राणा के पास शूटिंग के गुर सीखने के लिए भेज दिया। जिसके बाद उन्‍होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

बोल्ट की आत्मकथा पढ़कर प्रेरित हुईं मनु भाकर

टोक्यों ओलंपिक में अपने प्रदर्शन से हताश होकर मनु भाकर ने कुछ समय के लिए शूटिंग से दूरी बना ली थी। खुद को मोटिवेटेड करने मनु भाकर ने उसेन बोल्ट को देखकर और उनकी बायोग्राफी पढ़ी और प्रेरित हुई हैं। अपनी हताशा को जीत में बदलने की ठानी

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