Latest Updates
-
कौन हैं कुलदीप यादव की होने वाली पत्नी? मेहमानों के लिए शाही इंतजाम, 6000 की प्लेट और पहाड़ी 'कंडाली का साग' -
क्या फिर सच हो रही बाबा वेंगा की भविष्यवाणी! इजराइल-ईरान युद्ध के बीच LPG संकट की आहट -
Phool Dei 2026: उत्तराखंड की देहरियों पर कब बरसेंगे फूल? जानें 'फूलदेई' त्योहार की तिथि, महत्व और परंपरा -
शनिवार को तेल खरीदना शुभ या अशुभ? जानें धार्मिक कारण और पौराणिक कथा -
Hindu Nav Varsh 2026: कब से शुरू होगा हिंदू नववर्ष? जानें विक्रम संवत 2083 की तिथि और महत्व -
Kharmas 2026 Date: 14 या 15 मार्च, कब से शुरू हो रहा है खरमास? जानें इस दौरान क्या करें और क्या नहीं -
Friday the 13th: 13 तारीख को पड़ने वाले शुक्रवार को क्यों अशुभ मानते हैं लोग? जानें इसके पीछे का रहस्य -
World Sleep Day 2026: क्यों मनाया जाता है वर्ल्ड स्लीप डे? जानें इस दिन का इतिहास, महत्व और इस साल थीम -
Alvida Jumma 2026: औरतें अलविदा जुमा की नमाज कैसे पढ़ें? जानें सही तरीका, नियत और दुआ -
Alvida Jumma 2026: अलविदा जुमा की नमाज में कितनी रकात होती है? जानिए नमाज पढ़ने का तरीका, नियत और दुआ
कौन थी 'फ्यूंली' जिसकी याद में मनाया जाता है फूलदेई त्योहार? पढ़ें भावुक लोककथा
Phool Dei Chamma Dei Lyrics Meaning In Hindi: पहाड़ों में जब चैत्र की संक्रांति आती है, तो हवाओं में बुरांश की लाली और फ्यूंली की पीली मुस्कान घुल जाती है। बच्चों की टोलियां टोकरी में फूल लेकर घर-घर जाती हैं और गाती हैं "फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार..."। उत्तराखंड का यह 'फ्लावर फेस्टिवल' केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह एक बेटी के अपने मायके (पहाड़) के प्रति अगाध प्रेम की कहानी है। क्या आप जानते हैं कि फूलदेई की शुरुआत जिस 'फ्यूंली' के नाम से हुई, वह कौन थी?
आइए, आज आपको ले चलते हैं उत्तराखंड की उन वादियों में जहां एक राजकुमारी का प्रेम आज भी फूलों के रूप में खिलता है। साथ ही ये भी बता दें कि इस बार का ये त्योहार और भी खास हो जाता है क्योंकि इस बार फूलदेई के दिन ही पापमोचिनी एकादशी का शुभ संयोग भी बन रहा है।

फ्यूंली की लोककथा: एक बेटी का मायके के प्रति निस्वार्थ प्रेम
उत्तराखंड की लोक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में पहाड़ के एक घने जंगल में 'फ्यूंली' नाम की एक अत्यंत सुंदर वनकन्या रहती थी। वह प्रकृति की संतान थी; पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और नदियाँ ही उसके परिवार थे। उसकी उपस्थिति से पहाड़ों में हमेशा हरियाली और खुशहाली रहती थी। एक दिन एक दूर देश का राजकुमार उस जंगल में आया और फ्यूंली की सुंदरता पर मोहित हो गया। राजकुमार फ्यूंली से विवाह कर उसे अपने साथ मैदानी राज्य में ले गया। फ्यूंली के जाते ही पहाड़ उदास हो गए। नदियां सूखने लगीं, फूल मुरझा गए और चारों ओर सन्नाटा छा गया।
फ्यूंली की अंतिम इच्छा
राजमहल के वैभव के बीच फ्यूंली का मन हमेशा अपने मायके (पहाड़) के लिए तरसता रहता था। मायके की याद में वह बीमार पड़ गई। अंत समय में उसने राजकुमार से एक विनती की "मरने के बाद मुझे मेरी उसी पहाड़ी की चोटी पर दफनाना, जहां से तुम मुझे लाए थे। राजकुमार ने उसकी अंतिम इच्छा पूरी की। जिस जगह फ्यूंली को दफनाया गया, वहां कुछ समय बाद एक सुंदर पीला फूल खिला, जिसे 'फ्यूंली' नाम दिया गया। इस फूल के खिलते ही पहाड़ों में फिर से वसंत आ गया और हरियाली लौट आई। माना जाता है कि वह राजकुमारी आज भी फूलों के रूप में हर साल अपने मायके आशीर्वाद देने आती है। इसी की याद में फूलदेई का त्योहार मनाया जाता है।
'फूलदेई, छम्मा देई' गीत में छिपा है खुशहाली का वरदान
फूलदेई के दिन बच्चे जब देहरी पर फूल चढ़ाते हैं, तो वे एक विशेष मंगल गान गाते हैं। इसके शब्दों का अर्थ बहुत गहरा है:
फूलदेई: आपकी देहरी फूलों जैसी सुंदर और मंगलकारी हो।
छम्मा देई: घर की देहरी क्षमाशील हो और सबकी रक्षा करे।
दैणी द्वार: यह द्वार (घर) सबके लिए सफल और शुभ हो।
भर भकार: आपके अन्न के भंडार हमेशा भरे रहें।



Click it and Unblock the Notifications











