ध्‍यान दें! समय से पहले जन्‍में बच्‍चों को हो सकती है ये परेशान‍ियां

कभी कभी कुछ परिस्थितियों के कारण कुछ शिशुओं का जन्म नौ महीनों से पहले भी हो जाता है। उसे प्रीमैच्योर शिशु कहा जाता है। प्रीमैच्योर शिशु गर्भ के कठिन नौ महीनों से नहीं गुजरता और ऐसे शिशुओं को जन्‍म के बाद कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

13 बच्चों में से हर एक बच्चा 37 सप्ताह से पहले असमय पैदा होता है। उन्‍हें जीवनपर्यंत स्‍वास्‍थय और मानसिक विकास और सीखने की गति निर्धारित समय पर जन्में बच्चों के मुकाबले काफी धीमा होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों का विशेष ध्यान दिया जाता है। आइए हम आपको बताते है कि समय से पहले जन्में बच्चों को आम बच्चों के मुकाबले किन समस्याओं का सामना करना पड़ है-

कम होती है रोग-प्रतिरोधक क्षमता

कम होती है रोग-प्रतिरोधक क्षमता

प्रीमैच्‍योर बेबी को इंफेक्‍शन होने का सबसे ज्‍यादा खतरा रहता है। क्‍योंकि समय से पहले पैदा होने की वजह से बच्‍चों का वजन सामान्‍य की तुलना में कम होता है। जिससे बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता दूसरे बच्‍चों की तुलना में कम होती है जिससे उसे स्वास्‍थ्‍य संबंधी मुश्किलें अधिक आती हैं। हल्‍का सा मौसम परिर्वतन होते है बच्‍चों की इम्‍यून सिस्‍टम (रोगप्रतिरोधक क्षमता) पर इसका असर पड़ता है जिससे बच्‍चों को इंफेक्‍शन होने का खतरा ज्‍यादा मंडराता रहता है।

मानसिक बीमारी का खतरा

मानसिक बीमारी का खतरा

अगर बच्चे का जन्म नौ महीने पूरा होने से पहले हुआ है, तो हो सकता है कि बुढ़ापे में उन्हें किसी प्रकार की मानसिक बीमारी का सामना करना पड़ सकता है। कई अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों को द्विध्रुवी विकार, मानसिक अवसाद और मनोविकार की बीमारी हो सकती है और साथ ही सीजोफ्रेनिया, बाईपोलर डिसआर्डर और अवसाद जैसे मानसिक विकार होने का खतरा अधिक रहता है।

दिमागी बीमारी होने की सम्‍भावना

दिमागी बीमारी होने की सम्‍भावना

जो बच्‍चें 32 हफ्तों से पहले जन्‍म ले लेते है, उन्‍हें ब्रेन हेमरेज होने की सम्‍भावना अधिक रहती है। जब बच्‍चें मां के गर्भ में होते है तो हर सप्‍ताह के साथ उनका भी सम्‍पूर्ण विकास होता है। लेकिन समय से पूर्व जन्‍में बच्‍चों के दिमाग के विकास पर असर पड़ता है, ऐसे बच्चों की दिमागी क्षमता अन्य बच्चों के मुकाबले थोड़ी कम हो सकती है।

 फेफड़ों पर पड़ता है असर

फेफड़ों पर पड़ता है असर

प्रीमैच्‍योर बेबी को फेफड़ों और सांस से जुड़ी परेशानी जैसे अस्थमा, और सांस लेने में परेशानी होती है। इसके अलावा ब्रोन्कोपल्मोनरी डिस्प्लेजिया नामक समस्या हो जाती है जो फेफड़ों से जुड़ी क्रॉनिक डिसीज है। इसकी वजह से फेफड़ों का आकार या तो असामान्य होते है या फिर उनमें सूजन आ जाती है। हालांकि फेफड़ों के आकार तो समय के साथ सही आकार में आ जाते हैं लेकिन अस्थमा जैसे लक्षण जीवनभर नजर आते हैं।

आंतों से जुड़ी परेशानी

आंतों से जुड़ी परेशानी

प्रीमैच्योर पैदा होने वाले बच्चों में कई बार आंतों की समस्‍या देखने को मिलती है। ऐसे बच्‍चों में कई बार आंत ब्लॉक होने तक की नौबत आ जाती है। जिस वजह से खाना पचाने और भोजन से पोषक तत्व प्राप्त करने में परेशानी हो सकती है। जन्‍म के शुरुआती दिनों में अक्‍सर देखा गया है कि प्रीमैच्‍योर बेबी दूध भी पचा नहीं पाते है और वो उल्टियां कर देते हैं।

आंखों में परेशानी

आंखों में परेशानी

रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी एक ऐसी मेडिकल कंडीशन है जिसकी वजह से रेटिना की नसें अच्‍छे से विकसित नहीं हो सकती है। इस कारण आगे चलकर बच्चों को देखने में परेशानी महसूस होती है। प्रीमैच्योर बच्चों में सामान्य बच्चों की तुलना में आंखों से जुड़ी परेशानी अधिक होती है।

 हाइपोथिमिया की समस्या

हाइपोथिमिया की समस्या

थोड़ा सा भी मौसम बदलते ही प्रीमैच्योर बच्चों के शरीर का तापमान बहुत जल्‍दी गिर जाता है। दरअसल प्रीमैच्‍योर बेबी के शरीर में सामान्‍य बच्चों की तरह वसा का जमाव नहीं होता जिसके वजह से वे बच्चे शरीर में गर्मी को इकठ्ठा नहीं कर पाते। इन्‍हें हाइपोथिमिया की समस्या हो सकती है।

हाइपोथिमिया की समस्या होने पर बच्चे को सांस लेने में दिक्कत आ सकती है।

इस वजह से आहार से मिली पूरी एनर्जी शरीर में गर्मी उत्पन्न करने के लिए में ही खपत हो जाती है। जिससे बच्‍चें के शरीर के विकास पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है।

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