Latest Updates
-
Healthy Weight Loss Kela Stem Sabzi Recipe: फाइबर से भरपूर इस सब्जी को डिनर में शामिल करें -
World Bicycle Day 2026: क्यों मनाया जाता है विश्व साइकिल दिवस? जानें इतिहास, महत्व और साइकिल चलाने के 10 फायदे -
Jodhpur Style Pyaz Kachori Recipe: घर पर बनाएं बाजार जैसी कुरकुरी और चटपटी कचौरी -
Vibhuvana Sankashti Chaturthi 2026: विभुवन संकष्टी चतुर्थी कब है? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि -
मामा IPS, नाना रजिस्ट्रार और चाची राजनीति में, जानें Vaibhav Suryavanshi के परिवार में कौन क्या करता है? -
El Nino: क्या है एल नीनो, मानसून की बारिश और तापमान पर कैसे असर डालता है? जानिए सब कुछ -
Grandma Sunday Recipe Rajma Chawal Recipe: दादी के हाथ जैसा स्वाद अब घर पर पाएं -
दही के साथ भूलकर भी ना खाएं ये 5 चीजें, वरना बिगड़ सकती है सेहत -
Telangana Formation Day Quotes: गर्व से कहो जय तेलंगाना! अपनों को भेजें दिल को छू लेने वाले बधाई संदेश -
Indore Street Style Poha Recipe: घर पर बनाएं इंदौर जैसा चटपटा और खिला-खिला पोहा
जेनेटिक बीमारियों का पता लगाने के लिए गर्भावस्था में की जाती है कोरियोनिक विलस सैंपलिंग, जानिए
कोरियोनिक विलस सैंपलिंग (सीवीएस) प्रसव से पहले किया जाने वाला एक परीक्षण है जिसका उपयोग गर्भावस्था के दौरान जन्म दोष, आनुवांशिक बीमारियों और अन्य समस्याओं का पता लगाने के लिए किया जाता है। परीक्षण के दौरान, कोशिकाओं का एक छोटा सा नमूना ( जिसे कोरियोनिक विली कहा जाता है) नाल से लिया जाता है जहां यह गर्भाशय की दीवार से जुड़ता है। कोरियोनिक विली दरअसल, नाल के छोटे हिस्से होते हैं जो फर्टिलाइज्ड एग से बनते हैं, इसलिए उनके पास बच्चे के समान जीन होते हैं। अगर किसी गर्भवती महिला के होने वाले बच्चे में जन्म दोष या आनुवांशिक बीमारी होने का खतरा अधिक होता है तो सीवीएस करना एक अच्छा ऑप्शन है, ताकि गर्भावस्था में समस्याओं का जल्द पता चल सके। तो चलिए विस्तार पूर्वक जानते हैं सीवीएस यानी कोरियोनिक विलस सैंपलिंग के बारे में-

किस रोग या विकार की पहचान की जा सकती है?
सीवीएस क्रोमोसोमल समस्याओं को डाउन सिंड्रोम या अन्य आनुवांशिक बीमारियों जैसे सिस्टिक फाइब्रोसिस, टीए-सैक्स रोग और सिकल सेल एनीमिया के रूप में पहचानने में मदद कर सकता है। क्रोमोसोमल समस्याओं के निदान में सीवीएस को 98 प्रतिशत सटीक माना जाता है। यह प्रक्रिया भ्रूण के लिंग की पहचान भी करती है, इसलिए यह उन विकारों की भी पहचान कर सकता है जो एक लिंग से जुड़े होते हैं। हालांकि, सीवीएस न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट जैसे कि स्पाइना बिफिडा आदि का पता नहीं लगा पाता है।

सीवीएस के क्या लाभ हैं?
सीवीएस गर्भावस्था के शुरूआती दौर में आमतौर पर एमनियोसेंटेसिस से पहले किया जा सकता है, और इसके परिणाम आमतौर पर 10 दिनों के भीतर प्राप्त होते हैं। ऐसे में अगर महिला को परीक्षण के बाद असामान्य रिजल्ट प्राप्त होते हैं तो उनके लिए प्रेग्नेंसी को टर्मिनेट करना अधिक सुरक्षित होती है।

जानिए रिस्क भी
सीवीएस प्रक्रिया के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। मसलन, सीवीएस में एमनियोसेंटेसिस की तुलना में गर्भपात का थोड़ा अधिक जोखिम होता है क्योंकि प्रक्रिया प्रारंभिक गर्भावस्था में की जाती है। इससे संक्रमण भी हो सकता है। कुछ मामले में बच्चे की उंगलियों या पैर की उंगलियों में दोष के दुर्लभ केसेस भी देखे गए हैं, खासकर जब सीवीएस नौ सप्ताह से पहले किया गया था। इस संभावित जोखिम के कारण, 10 सप्ताह आम तौर पर इस परीक्षण को करने के लिए सबसे
शुरुआती सही समय है।

किसे करवाना चाहिए सीवीएस टेस्ट
यहां यह समझना आवश्यक है कि हर गर्भवती महिला को इस टेस्ट को करवाने की जरूरत नहीं है। जब शिशु में आनुवांशिक विकार का खतरा बढ़ जाता है, तभी इस टेस्ट को करवाने की सलाह दी जाती है। इन मामलों में मुख्य शामिल हैं-
• जिन महिलाओं ने 35 वर्ष या उससे अधिक उम्र में गर्भधारण किया हो। बच्चे में क्रोमोसोमल समस्या जैसे डाउन सिंड्रोम होने का जोखिम महिला की उम्र के साथ बढ़ जाता है।
• ऐसे कपल्स जिनके पास पहले से ही बर्थ डिफेक्ट वाला बच्चा है या कुछ जन्म दोषों का पारिवारिक इतिहास है।
• गर्भवती महिला, जिनमें अन्य टेस्ट में अबनॉर्मल जेनेटिक टेस्ट रिजल्ट आए हों।



Click it and Unblock the Notifications