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आपके बच्चे की इम्यूनिटी के लिए जरुरी है ये पांच वैक्सीन, जानें कब इन्हें लगाएं
बच्चे उन नाजुक फूलों की तरह होते है, जो जरा-सी गर्माहट से मुरझा जाते है। क्यूंकि उनकी इम्यूनिटी बड़ों से कम होती है। जिस तरह से वर्तमान में कोरोना की स्थिति बनी हुई है, उसे देखते हुए बच्चे की सेहत को लेकर किसी भी तरह का समझौता भारी पड़ सकता है। दरअसल इस महामारी ने उन्हें बीमारियों के प्रति सेंसिटिव बना दिया है जो सीधे उनकी इम्यून सिस्टम को प्रभावित करेगा। ऐसे में एक मजबूत इम्यून सिस्टम ही बच्चों में इंफेक्शन के जोखिम को कम कर सकता है और उन्हें एक्टिव और हेल्दी भी रखता है।
आज हम आपको उन पांच सबसे महत्वपूर्ण वैक्सीन शॉट्स के बारे में बताने जा रहे है जो कम उम्र से ही बच्चे की इम्यूनिटी को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।

चिकनपॉक्स (छोटी माता)
अपने बच्चे को चिकनपॉक्स से सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका है कि उसे वैक्सीन के 2 शॉट लगवाएं। पहली खुराक 12-15 महीने की उम्र के बीच और दूसरी खुराक 4-6 साल के बीच दी जानी चाहिए। चिकनपॉक्स बच्चों के इम्यून सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है। जो कि अत्यधिक संक्रामक रोग वैरीसेला-ज़ोस्टर वायरस (VZV) के कारण होता है। आमतौर पर, इस वैक्सीन के साइड इफेक्ट बहुत हल्के और अस्थायी होते हैं। जिसमें सामान्यत: गले में खराश, हल्का बुखार, चकत्ते और जोड़ों में अकड़न आदि शामिल हैं।

मीजल्स (खसरा)
बच्चों में एक और आम बीमारी, मीजल्स यानि खसरा जल्दी फैलता है, जिसके कारण तेज बुखार आता है और शरीर पर चकत्ते बन जाते है। इसलिए, 12-15 महीने और 4-6 साल की उम्र के बीच एमएमआर वैक्सीन के कम से कम 2 शॉट लगाने की सिफारिश की जाती है। यह वायरल डिजीज मॉर्बिलीवायरस नामक वायरस के कारण होता है, बड़ी बात ये है कि इसमें कम से कम 14 दिनों तक कोई लक्षण नहीं दिखाता। वैसे इसकी वैक्सीन टीकाकरण के साइडइफेक्ट चिकनपॉक्स जैसे ही हैं। कुछ मामलों में, बच्चों को कुछ दिनों तक दस्त की शिकायत रह सकती हैं।

फ्लू
हालांकि फ्लू विभिन्न आयु वर्ग के लोगों में आम है, लेकिन बच्चों के लिए यह बहुत खतरनाक हो सकता है क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम वयस्कों की तुलना में कमजोर होता है। इस बीमारी के संभावित जोखिम को रोकने के लिए 6 महीने के ठीक बाद वैक्सीन का एनुअल शॉट लेने की सिफारिश की जाती है। दरअसल वायरस जो होता है वो फेफड़ों, नाक और गले पर हमला करता है, और पुरानी बीमारी वाले बच्चों को इसका अधिक जोखिम होता है, खासकर 5 साल से कम उम्र के, ऐसे में ये वैक्सीन काफी फायदेमंद साबित होती है।

टाइफाइड
चूंकि बच्चे बाहरी वातावरण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, ऐसे में उन्हें टाइफाइड होने का खतरा अधिक होता है। ये संक्रमण दूषित भोजन और पानी से फैलता है। जो कई महत्वपूर्ण अंगों को संक्रमित करते हुए पूरे शरीर में फैल जाता है; ऐसे में ये पैरेंटस के लिए महत्वपूर्ण है कि वे अपने बच्चों को जन्म के तुरंत बाद इसका टीका लगवाएं। वैसे सामान्यत: टीसीवी की पहली खुराक 9-12 महीने की उम्र में दी जाती है।

टिटनेस
यह एक बहुत ही गंभीर बीमारी है जो नर्वस सिस्टम पर हमला करती है। ये एक बैक्टीरिया के कारण होती है जो टॉक्सिन पैदा करता है। चूंकि प्राकृतिक वातावरण के संपर्क में आने पर बच्चों को चोट लगने की सबसे अधिक संभावना होती है, इसलिए बैक्टीरिया के खुले घावों के जरिए उनके शरीर में प्रवेश करने की संभावना होती है। इसलिए, 2 से 12 साल की उम्र के बीच डीटीएपी की 5 डोज और टीडीएपी की 1 बूस्टर डोज लेने की सिफारिश की जाती है, जिसमें टिटनेस टॉक्सिन होते हैं।



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