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छोटो बच्चों को ट्यूशन भेजना चाहिए या नहीं, जानें क्या है सही उम्र ट्यूशन करने की
आजकल छोटे बच्चों को ट्यूशन भेजने का ट्रेंड कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। ऐसे में स्कूल की भारी भरकम फीस के अलावा ट्यूशन खर्च भी अब बच्चों से जुड़े खर्च में आवश्यक रूप से शामिल हो गया है। कुछ लोग प्राइवेट ट्यूटर भी हायर करते हैं जो उनके घर आकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। जबकि कुछ बच्चों को स्कूल में दिनभर पढ़ाई करने के बावजूद कोचिंग सेंटर में ट्यूशन पढ़ने के लिए जाने का दबाव ड़ाला जाता है। जबकि एक समय था जब ट्यूशन क्लास केवल वे स्टूडेंटस लेते थे, जिन्हें स्कूल में फोकस करने में कठिनाई होती थी या जिन्हें एक्सट्रा गाइडेंस की आवश्यकता होती थी।
यानि उस समय ट्यूशन जाने वाले बच्चों की तादाद बहुत कम थी। तो आखिर अब ऐसा क्या हो गया कि बच्चे को ट्यूशन भेजने का दबाव बढ़ गया है। क्या आप भी उन लोगों में है जो सिर्फ दूसरों की देखादेखी में अपने बच्चे को ट्यूशन भेज रहे है। आपको नहीं लगता है कि ये समय, पैसा और प्रयास का एक एक्स्ट्रा इंवेस्टमेंट है। तो सवाल ये उठता है कि क्या छोटी उम्र से ही बच्चे को ट्यूशन क्लास भेजना सही है, या हमें बच्चे को घर पर ही पढ़ाना चाहिए। आइए इस गहन मसलें के कुछ अनछुए पहलूओं के बारे में जानते है।

बच्चों के जन्म के साथ ही पेरेंटस की उम्मीदें बढ़ जाती है। और जिस तरह अभी कॉम्पीटिशन चल रहा है, उसे देखते हुए शायद हर पेरेंटस के मन में बच्चे के पढ़ाई में पीछे छूट जाने का डर है। शायद यही कारण है कि माता-पिता तीन साल के छोटे बच्चे के लिए भी ट्यूशन फिक्स कर देते हैं। जबकि वो ये नहीं समझते कि ये उम्र बच्चे के स्वतंत्र रहने की है। अगर इस छोटी-सी उम्र में हमने अपने नौनिहालों को पढ़ाई की जंजीरों में बांधा तो इससे उनकी मानसिक स्थिति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। अपने बच्चे को शिक्षा की ओर अत्यधिक धकेलना, उनके समग्र विकास, आत्मविश्वास और विकास में असंतुलन पैदा कर सकता है। तो आराम से बैठकर सोचिए कि क्या आपका ये कदम सही है।
वैसे अभी जिस तरह का दौर चल रहा है। उसमें हर बच्चे पर बचपन से ही रेस में आगे बढ़ने का दबाव ड़ाला जाता है। यही कारण है कि 2 से 3 साल के बच्चों को भी प्रीस्कूल भेज दिया जाता है। इतना ही नहीं घर आने के बाद इन्हें पेरेंटस ट्यूशन भेज देते है। ताकि वे किसी से कम नहीं रहें। लेकिन क्या आप जानते है कि छोटे बच्चे को ऐसे इंसान के पास भेजना जो उसके लिए अंजान है, उसके अंदर डर पैदा कर सकता है। यहां जाकर बच्चा अकेलापन महसूस कर सकता है। जबकि, अपने बड़े भाई-बहन के साथ पढ़ाई करना दोनों बच्चों के बीच के बंधन को मजबूत करने और बच्चे के विकास के लिए सहायक हो सकता है।

महत्वपूर्ण सुझाव
* देखा जाए तो प्ले ग्रुप से लेकर 5वीं क्लास तक के बच्चे बहुत मासूम होते हैं। उन्हें अपने अच्छे-बुरे की समझ नहीं होती। वे डर भी जल्दी जाते हैं। इस उम्र में अगर उन्हें स्कूल की पढ़ाई के बाद कोचिंग या ट्यूशन के लिए भेजा जा रहा है तो इससे उनकी ग्रोथ पर फर्क पड़ सकता है।
* छोटे बच्चों के लिए स्कूल की 6-7 घंटे की पढ़ाई काफी होती है। इसके बाद घर आकर वे होमवर्क या सेल्फ स्टडी तो कर सकते हैं। लेकिन अगर आप उसे तुरंत कोचिंग या ट्यूशन भेजेंगे, तो वे मेंटली काफी थक जाएंगे। और इसका असर उनकी फिजिकल एक्टिविटी में नजर आ सकता है।
* अगर ट्यूशन या कोचिंग टीचर के बजाय पेरेंटस बच्चे को होमवर्क करवाएंगे या उनके साथ कुछ समय बिताएंगे तो आपकी उनके साथ अंडरस्टेडिंग बेहतर होगी।
* अगर घर में दो बच्चे हैं तो बेहतर रहेगा कि उसे कहीं और पढ़ने के लिए भेजने की बजाय आप उन्हें साथ में पढ़ाई करने के लिए कहें। इससे वे बेहतर तरीके से पढ़ाई कर सकेंगे।



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