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जज़्बात, जोश और जिस्म
प्यार में सेक्स हो सकता है, पर सेक्स में प्यार हो ये ज़रूरी नहीं। आधुनिकता ने रिश्तों में इश्क और सेक्स को उलझा सा दिया है, जहां जायज़ और नाजायज़, सही-गलत, परिपक्वता-अपरिपक्वता जैसे मुद्दे कटीली घास की तरह उग आये हैं।
कब तक मैं सेक्स शब्द सुनते ही मुंह फेरकर बात पलटता रहूं ..? किसी फिल्म या सीरियल के बीच यदि कंडोम का ऐड आ जाये, तो झट से रिमोट थामकर अगला चैनल टयून क्यूं कर दूं ...? समाज के चार लोगों में सेक्स परिपक्वता के पर्दों के पीछे पड़ा-पड़ा सड़ता रहेगा और वक्त आने पर इसका इस्तेमाल सही-गलत तरीके से होता रहेगा। जब भी यह कहीं किराये के कमरों या होटलों में मूंह छिपाये बैठा दिखेगा, इस पर लाठियां बरसेंगी और फिर नारे गूंजने लगेंगे कि ज़रूरत है सेक्स शिक्षा को शुरु करने व इसे बढ़ावा देने की। पहले दिन अखियां लड़तीं हैं, अगले दिन दोस्ती, उसके अगले दिन इज़हार और फिर प्यार बिस्तर पर आकर सिसकियां लेने लगता है। कहीं इच्छाएं और शारीरिक बदलाव प्यार की गलत परिभाषा तो नहीं गढ़ रहे हैं ...? कहीं सेक्स को प्यार का प्रसाद तो नहीं माना जा रहा है ...? क्यूं आज का ज्यादातर युवा, प्यार और सेक्स को एक ही तराजू में तौलता चल रहा है ...? वजह साफ है, या तो उसने अंजाम की परवाह नहीं की है या फिर वह जवानी के जोश-जुनून में अपनी और अपने साथी की इज्ज़त अपने ही हाथों कुचल रहा है। पुरुषों के लिये महिलाओं को कभी नहीं त्यागनी चाहिये ये खुशियां
विक्की एक स्टाइलिश और फैशनकांसियस लड़का है। उसके मज़बूत बाइसेप्स और रॉयल इनफील्ड बाइक से अक्सर लड़कियां इंप्रेस होकर उसकी हो जाया करतीं हैं। उसने पिछले सप्ताह अपनी नई बैचमेट सौम्या को प्रपोज़ किया और "प्यार" के पंचनामे में वह आखिरकार पास हो गया। देर रात पार्टी, घूमना-फिरना, शॉपिंग-वांडरिंग, उसका रुटीन बन चुका था। लगभग दो सप्ताह बाद उसने सौम्या को अपने पैरेंटस की गैर-मौजूदगी में घर बुलाया, और अपना शारिरिक "प्रपोज़ल" उसके सामने रखा, जो रिजेक्ट हो गया, और तुरंत 'सच्चा प्यार' कांच की तरह टूट कर बिखर गया। विक्की ने उसे अपनी जि़ंदगी से बाहर का रास्ता दिखा दिया और दलील दी कि शायद उसे अपने लवर पर यकीन नहीं है और वह उसे ठीक से जान ही नहीं पाई है। कुछ महीनों बाद दोनों फिर मिले और विक्की ने सौम्या को उसकी शर्तों के साथ दोबारा अपनाया और आज वे दोनों एक इशकज़ादे की तरह खुलकर जी रहे हैं, मुस्करा रहे हैं, और खुश भी हैं। यह सेक्स का एक पहलू है, जो प्यार जैसे साफ-सुथरे बर्तन में जगह बनाना चाहे तो उसे फटकार मिलती है। यहां शारीरिक सम्बंधों के लिए नो एंट्री है लेकिन साथी पर समर्पण की भरपूर ज़रूरत।

एक युवा आकाश भी है, जो बेहद होशियार, पढ़ने-लिखने में ब्रिलिएंट और साफ दिल इंसान है। उसकी लाइफ में पिछले कई सालों से एक ही लड़की थी। दोनों की दोस्ती बचपन से ही फल-फूल रही थी, और ग्रेजुएशन में आते-आते वह रिश्ते में बदल चुकी थी। आकाश उसे बेहद प्यार करता था, दोनों साथ-साथ कॉलेज-कोचिंग जाया करते थे। निजी जि़ंदगी में आकाश ने कभी सेक्स को तवज्जो नहीं दी, वह अपने साथी की मुस्कराहट और हाथों में हाथ, से ही खुश था। कुछ दिनों बाद उसकी गर्लफ्रेंड ने किसी और का दामन थाम लिया और आकाश को कुछ ऐसा जवाब मिला जिसकी उसने कभी उम्मीद ही नहीं की थी। उस पर रिश्ते को ढोने का इल्जाम लगा और बेहद साफ-सुथरे इश्क के बदले उसकी गर्लफ्रेंड ने उसे बुद्धू और बोरिंग ब्वॉफ्रेंड का तमगा दिया। आकाश खुद को समर्पित तो कर रहा था पर अपने साथी को, उसके ही शब्दों में कहें तो संतुष्ट नहीं कर सका। सेक्स और प्यार में यहीं नौंक-झौंक हो जाया करती है। प्यार समर्पर्ण चाहता है और सेक्स संतुष्टि। दोनों स्थितियों में आपको मैनेज करना है। यह कहानी किसी लड़के या लड़की पर केन्द्रित नहीं है, यह ज्यादातर घट रहे किस्सों का एक उदाहरण मात्र है।
आजकल की मुहब्बत में सेक्स को नए सिरे से भी प्रयोग में लाया जा रहा है। यदि लड़की सेक्स के लिए मना करती है, तो उसका पुरुष मित्र उस पर भरोसा न होने की बात कहता है। सेक्स का सबसे बड़ा नुकसान और जोखिम यही है कि बंद कमरे के इस 'प्यार' के बाद रिश्ते की उम्र बढ़ेगी या उल्टा कम होगी ? तमाम सर्वे दिखाते हैं कि शादी से पहले सेक्स न सिर्फ आगे चलकर अपनेपन का प्रतिशत घटा देता है, बल्कि आपसी वयवहार में भी तनातनी पैदा होने लगती है। यहां अपरिपक्वता की सामाजिक दलीलें भी जायज़ दिखाई पड़ती है। वहीं एक धड़ा सेक्स से रिश्ते को मज़बूती और लांगलाइफ रनिंग की बहस करता है। आधुनिकता ने रिश्तों में इश्क और सेक्स को उलझा सा दिया है, जहां जायज़ और नाजायज़, सही-गलत, परिपक्वता-अपरिपक्वता जैसे मुद्दे कटीली घास की तरह उग आये हैं। यदि समय रहते हम युवाओं ने सेक्स-प्यार को बिल्कुल अलग कर, इसके महत्व-अच्छाई-बुराई को नहीं समझा तो हम न सिर्फ अपनी छवि पर दाग लगा बैठेंगे साथ ही भविष्य की खुशियों की चाबी भी खो देंगे।
बीच के रास्ते पर चलने के लिए हमें रिश्ते में सेक्स की एक उम्र, परिस्थिति को खुद ही तय करना होगा। प्यार का मतलब साथी की इच्छाओं का ख्याल रखना है, उसकी हर इच्छा पूरी करना कतई नहीं। विश्वास-अविश्वास की लड़ाई में जिस्मानी सम्बंध आगे चलकर सिर्फ दुःख व परेशानी ही पैदा करते हैं। जब तक इस छिपी आदत को जोश-जुनून से जोड़कर देखा व लिया जाता रहेगा, सेक्स का सिर्फ घृणित रूप ही सामने आयेगा। कहते हैं प्यार अंधा होता है, पर अब वक्त आ गया है कि प्यार को होश-ओ-हवास के दायरे में रखा जाये न कि हवस के चंगुल में। समर्पण और संतुष्टि दोनों ही ज़रूरी हैं पर सही वक्त पर ।



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