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Kajari Teej Lokgeet Lyrics: कजरी तीज के मौके पर गाएं ये पारंपरिक लोकगीत, सहेलियों के साथ खूब आएगा मज़ा
Kajari Teej Lokgeet Lyrics: कजरी तीज भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो मुख्य रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है। यह पर्व खासतौर पर महिलाओं के लिए होता है, जो इस दिन व्रत रखती हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं। कजरी तीज के साथ लोकगीतों का गहरा संबंध है, जो इस त्योहार को और भी विशेष बनाते हैं।
कजरी तीज के लोकगीत भारतीय ग्रामीण समाज की भावनाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को व्यक्त करते हैं। ये गीत मानसून की सौंदर्यता, प्रकृति के सौंदर्य, प्रेम, और नारी के भावनात्मक अनुभवों को प्रतिबिंबित करते हैं। लोकगीतों में नारी की पीड़ा, उसकी आशाओं, और उसके प्रेम को भावुकता के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

कजरी के गीतों में न केवल लोक जीवन की झलक मिलती है, बल्कि यह भी दिखाया जाता है कि महिलाएं कैसे इस पर्व को मनाकर अपनी भावनाओं को प्रकट करती हैं। इन गीतों के माध्यम से महिलाएं अपनी व्यथा, प्रेम, और सामूहिकता को साझा करती हैं, जो इस पर्व की आत्मा को समृद्ध बनाते हैं।
इस प्रकार, कजरी तीज पर लोकगीतों का महत्व न केवल मनोरंजन में है, बल्कि यह लोकसंस्कृति की पहचान और सामाजिक बंधन को भी मजबूत करता है। यहां हम आपके लिए लेकर आये हैं कजरी तीज के कुछ पारंपरिक गीतों के बोल।
1. हरी रामा सावन बीता जाय सजन नहीं आये रे हारी
हरी रामा सावन बीता जाय सजन नहीं आये रे हारी
सजन नहीं आये रे हारी सजन नहीं आये रे हारी
हरी रामा सासु हमारी अति समुझाबयं रामा
मोर बहुआ राखा धीरज मन माही ललन घर अइहइं रे हारी
ललन घर अइहइं रे हारी ललन घर अइहइं रे हारी
हरी रामा सावन बीता जाय...
हरी रामा जेठी हमारी अति समुझाबयं रामा
मोर लहुरी राखा करेजबा मा पीर देवर घर अइहइं रे हारी
देवर घर अइहइं रे हारी ललन घर अइहइं रे हारी
हरी रामा सावन बीता जाय......
हरी रामा ननदी हमारी अति समुझाबयं रामा
मोर भउजी राखा नयनबा मा नीर बीरन घर अइहइं रे हारी
बीरन घर अइहइं रे हारी ललन घर अइहइं रे हारी
हरी रामा सावन बीता जाय.....
2. आई सावन की बहार
छाई घटा घनघोर बन में, बोलन लागे मोर।
रिमझिम पनियां बरसै जोर मोरे प्यारे बलमू।।
धानी चद्दर सिंआव, सारी सबज रंगाव।
वामें गोटवा टकाव, मोरे बारे बलमू।।
मैं तो जइहों कुंजधाम, सुनो कजरी ललाम।
जहाँ झूले राधे-श्याम, मोरे बारे बलमू।।
बलदेव क्यों उदास पुनि अइहौ तोरे पास।
मानो मोरा विसवास, मोरे बारे बलमू।।
3. हरि बिन जियरा मोरा तरसे
हरि बिन जियरा मोरा तरसे, सावन बरसै घना घोर।
रूम झूम नभ बादर आए, चहुँ दिसी बोले मोर।
रैन अंधेरी रिमझिम बरसै, डरपै जियरा मोर।।
बैठ रैन बिहाय सोच में, तड़प तड़प हो भोर।
पावस बीत्यौ जात, श्याम अब आओ भवन बहोर।।
आओ श्याम उर सोच मिटाऔ, लागौं पैयां तोर।
हरिजन हरिहिं मनाय 'हरिचन्द' विनय करत कर जोर।।
4. तरसत जियरा हमार नैहर में
तरसत जियरा हमार नैहर में ।
बाबा हठ कीनॊ, गवनवा न दीनो
बीत गइली बरखा बहार नैहर में ।
फट गई चुन्दरी, मसक गई अंगिया
टूट गइल मोतिया के हार, नैहर में ।
कहत छ्बीले पिया घर नाही
नाही भावत जिया सिंगार, नैहर में।
5. देखो सावन में हिंडोला झूलैं
देखो सावन में हिंडोला झूलैं मन्दिर में गोपाल।
राधा जी तहाँ पास बिराजैं ठाड़ी बृज की बाल।।
सोना रूपा बना हिंडोला, पलना लाल निहार।
जंगाली रंग, सजा हिंडोला, हरियाली गुलज़ार।।
भीड़ भई है भारी, दौड़े आवैं, नर और नार।
सीस महल का अजब हिंडोला, शोभा का नहीं पार ।।
फूल काँच मेहराब जु लागी पत्तन बांधी डार।
रसिक किशोरी कहै सब दरसन करते ख़ूब बहार।।
6. छैला छाय रहे मधुबन में
छैला छाय रहे मधुबन में सावन सुरत बिसारे मोर।
मोर शोर बरजोर मचावै, देखि घटा घनघोर।।
कोकिल शुक सारिका पपीहा, दादुर धुनि चहुंओर।
झूलत ललिता लता तरु पर, पवन चलत झकझोर।।
ताखि निकुंज सुनो सुधि आवै श्याम संवलिया तोर।
विरह विकल बलदेव रैन दिन बिनु चितये चितचोर।।
7. हरि संग डारि-डारि गलबहियाँ
हरि संग डारि-डारि गल बहियाँ झूलत बरसाने की नारि।
प्रेमानन्द मगन मतवारी सुधि बुधि सकल बिसारि।।
करि आलिंग प्रेमरस भीजत अंचल अलक उघारि।
टूटे बोल हिंडोल उठावति रुकि-रुकि अंग संवारि।।
श्रीधर ललित जुगल छबि ऊपर डारत तन-मन वारि।
हरि संग डाल-डाल गलबहियाँ, झूलत बरसाने की नारि।।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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