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ब्यूटी टाइकून शाहनाज हुसैन से जानिए सक्सेस मंत्रा, सीखने का कोई शार्टकट नहीं होता

इतिहास के पन्ने पलटने पर एक बात सामने आती है कि हर गुरु ने अपने शिष्यों को बहुत कुछ दिया। बस, लेने वाले पात्र ने अपनी बु़ि़़द्ध और सीमा के अनुसार पात्र भरा है। या यूं कहें कि किसी के नामचीन बनने में गुरु का अहम योगदान रहता है। जिस प्रकार कुम्हार घड़े को पीट-पीट कर स्वरुप देता है, उसी प्रकार गुरु के दंड से शिष्य सुयोग्य बनते हैं। किसी भी समाज का बेहतर सशक्तीकरण तभी हो सकता है, जब शिक्षक और शिष्य के बीच बेहतर समन्वय हो। स्वस्थ संवाद हो। शिष्य अपने गुरुओं का आदर करते हैं, गुरुओं को भी चाहिए कि वे बच्चों की जरूरतों का ध्यान रखे। बीते दिनों मैंने एक ब्लाइंड स्कूल को सुविधायुक्त करने का प्रण लिया था। मैंने नई दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री मार्ग स्थित ब्लाइंड स्कूल का दौरा किया था। वहां के नेत्रहीन छात्रों से मिलीं। उसके बाद ब्लाइंड स्कूल की छात्राओं और छात्रों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वह उन्हें विश्वस्तरीय प्रशिक्षण देने का प्रण लिया। हम लगातार वहां कर काम कर रहे हैं। यह दिव्यांग बालिकाएं हमारे समाज का ही हिस्सा है और इसके मान सम्मान के लिए मेरी तरफ से हर संभव मदद की जा रही है।
जब मैं या कोई और सार्वजनिक जीवन में होते हैं, तो कई प्रकार की बातें होती है। अच्छी और बुरी। यह हम पर निर्भर करता है कि हम किसके साथ जाएं। मैं कई दशक से ब्यूटी फेयरनेस के क्षेत्र में काम कर रही हूं। हमारे कई संस्थान देश-विदेश में चल रहे हैं। लाखों युवक-युवतियों ने इसमें प्रशिक्षण लिया है। वे अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। संभव है, कई जगहों से कुछ शिकायते हों, लेकिन हमने जिन्हें प्रशिक्षित किया है, उन पर भरोसा है। हम उन पर गर्व करते हैं।
ऐसा नहीं है कि मुझे स्कूल-कॉलेज के शिक्षक ही सिखाते हैं। पढ़ाते हैं। मुझे तो पिताजी ने खेल-खेल में बहुत कुछ सिखया। बेशक उस समय उनकी सीख को नहीं समझ पाईं, लेकिन किशोरमन पर वे बातें अंकित हो गई। जब पिताजी शेव करते थे, मुझे शेक्सपियर की कविताएं सुनाते और याद करवाते थे। इतना ही नहीं, कविताएं लिखने के लिए भी कहते थे। लेकिन बचपन में मेरे लिए ये सब एक पहेली जैसा था, लेकिन जब इंटरनेशनल ब्यूटी क्रॉन्फ्रेंस और प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुंचीं, तब मुझे आभास हुआ कि पिता ने मुझे क्या सीखाया था।
मैं तो अपने हर उस बच्चे से कहती हूं कि वो खुद पर भरोसा रखें। हमारा संस्थान भले ही उन्हें पढाया है, सिखाता है, लेकिन काम उनको ही करना है। जब मेरे मैनेजमेंट गुर को विश्वविख्यात हावर्ड यूनिवर्सिटी ने अपने सिलेबस में शामिल किया था, तो वह मेरे लिए नहीं, हमारे संस्थान और देश के लिए गर्व की बात थी। हम अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं आज इस मुकाम पर अचानक से आ गई। छोटी उम्र में शादी होने के कारण मैं ग्रेजुएशन नहीं कर पाई थी। मुझे किसी भी कॉलेज में दाखिला नहीं मिला था। तब मैंने तय किया कि ब्यूटी केयर की ट्रेनिंग लूंगी और पैरामेडिकल फील्ड में अपना करियर बनाउंगी। तेहरान से लंदन आ गई और यहीं बेटी के साथ रहकर ब्यूटी केयर की ट्रेनिंग ली। पति तेहरान में ही थे। मैंने इसी दौरान लंदन, जर्मनी और पेरिस के जाने-माने ब्यूटी केयर ट्रेनिंग सेंटर में कॉस्मेटोलॉजी और कॉस्मेटिक केमिस्ट्री की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान जाना कि सिंथेटिक कॉस्मेटिक्स नुकसानदेह होते हैं।
मुझे हर्बल में बचपन से ही रुचि थी, क्योंकि मैंने अपने दादाजी को इन पर काम करते देखा था। अपने अनुभव से मैं सोची कि जड़ी-बूटियां ही हमारी नेचुरल केयर कर सकती हैं। फिर क्या था, कदम दर कदम सीखती गई। कई इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया और पूरी दुनिया को बताया कि ब्यूटी के लिए हर्बल ही सबसे बेहतर है। इसलिए मैं तो अपने हर बच्चों से कहती हूं कि मैं या हमारे संस्थान का कोई भी एक्सपर्ट तुम को केवल बता सकता है। जानकारी दे सकता है। सीखना तुमको ही है। सीखने का कोई शार्टकट नहीं होता है। सफलता एक दिन में नहीं मिलती है। इसके लिए एक दूरी करनी होती है।



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