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Gulzar's 89th Birthday: कभी गैराज में किया था मैकेनिक का काम, आज हॉलीवुड तक है धाक, ऐसी है गुलजार की जिंदगी
Gulzar's Birthday: 18 अगस्त 1934 को जन्मे मशहूर गीतकार, फिल्ममेकर और शायर गुलजार का आज 89वां बर्थडे है। झेलम जिले (अब पाकिस्तान का हिस्सा) में जन्मे संपूर्ण सिंह जिन्हें अब पूरी दुनिया गुलजार के नाम जानती है, आज किसी परिचय के मोहताज नहीं। गुलजार के जन्मदिन के इस मौके पर हम आपको उनकी निजी जिंदगी के कई अनजान पहलुओं से रु-ब-रु कराएंगे।

रवींद्र नाथ टैगोर की किताब ने बदल दी जिंदगी
गुलजार बचपन में अपने पिता के साथ दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। दिल्ली के सदर बाजार में थैले और टोपी की दुकान खोल ली। इसी के सामने एक बुक स्टॉल थी, जहां पर किताबें किराए पर मिलतीं। वक्त गुजारने के लिए गुलजार ने किताबें पढ़नी शुरू कीं। क्राइम थ्रिलर किताबों का ऐसा चस्का लगा कि वो रात-रात भर जागकर पूरी किताब पढ़ जाते।
गुलजार हर रोज एक नई किताब लेने चले जाते। उनकी इस आदत से स्टॉल का मालिक भी परेशान हो गया। दरअसल, स्टॉल पर 4 आने पर हफ्ते भर किताबें पढ़ने की छूट थी।
गुलजार हर रोज उस स्टॉल पर जाकर नई किताब लेते थे। एक दिन तंग आकर स्टॉल के मालिक ने गुलजार को रवींद्र नाथ टैगोर की किताब का उर्दू ट्रांसलेशन दे दिया। इस किताब ने गुलजार की पूरी दुनिया ही बदल दी और इसे पढ़ने के बाद ही उन्होंने राइटर बनने का मन बना लिया। किताबें पढ़ने के साथ उन्होंने लिखना भी शुरू कर दिया।
इसके बाद देश का विभाजन शुरू हो गया। बंटवारे के भयानक मंजर ने उनसे बहुत कुछ छीन लिया, जिसका दर्द उनके गानों और नज्मों में साफ देखने को मिलता है। इसी वक्त वो मुंबई आकर अपने बड़े भाई के साथ रहने लगे।
गुजारे के लिए गैराज में काम किया
बंटवारे का असर परिवार की आर्थिक हालत पर भी पड़ा। नतीजतन उन्होंने पढ़ाई छोड़ मुंबई के बायकुला के गैराज में काम करना शुरू किया। यहां पर उनका काम एक्सीडेंट में खराब हुई गाड़ियों को पेंट करने के लिए कलर सैंपल बनाना होता था।
ऐसे मिला फिल्म इंडस्ट्री में पहला ब्रेक
किस्सा ये है कि फिल्म बंदिनी के सभी गानों को शैलेंद्र ने लिखा था। सिर्फ एक गाना लिखने को बचा था तभी शैलेंद्र की बिमल रॉय से अनबन हो गई और उन्होंने साथ काम करने से मना कर दिया। तब देबू सेन जो कि गुलजार के रूममेट हुआ करते थे। उन्होंने बिमल रॉय को गुलजार का नाम सुझाया। इसके बाद गुलजार गुलजार बंदिनी के लिए मोरा गोरा अंग लई ले...! गाना लिखा जिसे एसडी बर्मन ने शब्दों को राग में पिरोकर बिमल रॉय को ऐसे सुनाया कि उन्होंने झट से गाने के लिए हां कर दी और इस तरह उन्हें करियर का पहला ब्रेक मिला। ये गाना आगे चलकर सुपरहिट रहा। इस गाने के बाद बिमल रॉय ने गुलजार के टैलेंट को देखते हुए बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर अपने साथ जोड़ लिया।
गुलजार के लिए राखी ने छोड़ दी थी फिल्में
राखी और गुलजार की पहली मुलाकात बॉलीवुड की एक पार्टी में हुई थी। ऐसा कहा जाता है कि राखी को देखकर गुलजार को पहली ही नजर में उनसे प्यार हो गया था। यहां से दोनों के बीच मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा और दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठे। साल 1973 में दोनों ने एक दूसरे से शादी कर ली। गुलजार को राखी का फिल्मों में काम करना पसंद नहीं था, जिसकी वजह से शादी के बाद राखी ने फिल्मों से दूरी बना ली।
एक गलतफहमी की वजह से टूटा था रिश्ता
बात 1975 की है जब फिल्म 'आंधी' की शूटिंग कश्मीर में चल रही थी। उस दौरान राखी मुंबई थी लेकिन एक फिल्म में काम करने की इजाजत लेने के लिए वो भी गुलजार से मिलने कश्मीर पहुंच गई। गुलजार अपने काम में व्यस्त रहते और राखी अकेली कमरे में रहती थीं। एक दिन फिल्म 'आंधी' की यूनिट की पार्टी चल रही थी, फिल्म में लीड स्टार संजीव कुमार नशे की हालत में अभिनेत्री सुचित्रा का हाथ पकड़ लिया। इससे सुचित्रा काफी नाराज हो गईं थी। इसके बाद गुलजार सुचित्रा को उनके कमरे में छोड़ने जा ही रहे थे कि उन्हें रास्ते में राखी मिल गई। दोनों को साथ में देखकर राखी उन्हें शक हो गया कि दोनों के बीच कोई दूसरा रिश्ता है।
यही बात वो गुलजार से पूछ बैठीं। राखी के इल्जाम से वो बहुत आहत हुए और उन्होंने राखी को थप्पड़ मार दिया। इस बात से दुखी होकर गुस्से में तिलमिलाई राखी ने गुलजार से पूछे बिना यश चोपड़ा की फिल्म साइन कर ली। इस घटना के बाद राखी गुलजार से अलग फॉर्म हाउस में रहने लगीं। हालांकि, उन्होंने कभी तलाक नहीं लिया। दोनों आज भी बेटी मेघना के लिए साथ हैं। हर एक फंक्शन वो साथ मिलकर सेलिब्रेट करते हैं।
फिल्म फ्लॉप होने पर डिप्रेशन में चले गए थे
1971 की फिल्म मेरे अपने गुलजार की डायरेक्टोरियल डेब्यू फिल्म थी। उन्होंने 17 फिल्में डायरेक्ट की थीं। फिल्म हू तू तू (1999) के बाद उन्होंने डायरेक्शन करना बंद कर दिया। दरअसल, ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पिट गई। फिल्म की असफलता गुलजार बर्दाश्त नहीं कर पाए और डिप्रेशन में चले गए। इस दौर में बेटी मेघना ने उनका सबसे ज्यादा सपोर्ट किया था और इस कंडीशन से उन्हें बाहर लाई थीं।
5 नेशनल अवॉर्ड और 1 ग्रैमी अवॉर्ड से सम्मानित
उनके इस योगदान के लिए उन्हें 2004 में पद्मभूषण से नवाजा गया था। इतना ही नहीं उन्हें 20 बार फिल्मफेयर और 5 फिल्म कोशिश (1972), मौसम (1975), इजाजत (1987), लेकिन (1991) और माचिस (1996) के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था। साल 2010 में उन्हें 'स्लमडॉग मिलेनियर' के गाने 'जय हो' के लिए ग्रैमी अवॉर्ड मिल चुका है।



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