Latest Updates
-
World Nature Conservation Day 2026: क्यों मनाते हैं विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस? जानें इसका इतिहास और महत्व -
World Hepatitis Day 2026: हेपेटाइटिस क्या है? जानें इसके लक्षण, कारण, प्रकार और बचाव के उपाय -
CJP के बाद किसने शुरू की E20 जनता पार्टी? सोशल मीडिया पर जुड़े लाखों फॉलोअर्स, जानें क्या है मांग -
कौन हैं Indian Idol 16 की विनर ज्योतिर्मयी नायक? कैंसर मरीजों को देती थीं थेरेपी, अब है ये सपना -
Bank Holidays August 2026: अगस्त में 14 दिन बंद रहेंगे बैंक, यहां देखें छुट्टियों की पूरी लिस्ट -
APJ Abdul Kalam Death Anniversary: सपनों को पूरा करने का हौसला देते हैं डॉ. कलाम के ये 10 प्रेरणादायक विचार -
Jaya Parvati Vrat Katha: जया पार्वती व्रत में जरूर करें इस व्रत कथा का पाठ, मिलेगा अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद -
Jaya Parvati Vrat 2026: जया पार्वती व्रत आज से शुरू, जानें पूजा मुहूर्त, विधि और महत्व -
National Parents Day 2026 Wishes: आपकी उंगली पकड़कर चलना सीखा...पेरेंट्स डे पर माता-पिता को भेजें ये खास संदेश -
Kargil Vijay Diwas 2026 Wishes: तिरंगे की शान...कारगिल विजय दिवस के मौके पर अपनों को भेजें ये शुभकामना संदेश
बच्चों को ऑटिज्म का शिकार बना रही मोबाइल फोन की लत, AIIMS की रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
Aiims Research: क्या आप भी बच्चे को चुप कराने के लिए मोबाइल थमा देते हैं? यह तरीका भले ही कुछ समय के लिए काम आ जाए, लेकिन लंबे समय में यह उनकी मानसिक सेहत पर असर डाल सकता है। ज्यादा देर तक स्क्रीन देखने से बच्चे का दिमागी विकास प्रभावित होता है और वह धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से दूर होने लगता है। एम्स की एक रिसर्च में सामने आया है कि कम उम्र में स्मार्टफोन और गैजेट्स का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों के विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है। खासकर मोबाइल, टीवी और अन्य स्क्रीन के अधिक उपयोग से बच्चों में "वर्चुअल ऑटिज्म" जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ने की बात कही गई है। अध्ययन के अनुसार, दो साल से कम उम्र के जिन बच्चों को नियमित रूप से मोबाइल देखने की आदत लग जाती है, उनमें विकास से जुड़ी गंभीर दिक्कतें ज्यादा देखने को मिलीं। जिन बच्चों को जन्म से लेकर लगभग 18 महीने तक स्क्रीन की आदत रही, उनमें ऑटिज्म जैसे लक्षण अधिक पाए गए।

ऑटिज्म में बच्चों का व्यवहार क्यों होता है अलग?
ऑटिज्म एक ऐसा न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जो बच्चे की समझने, बोलने और दूसरों से जुड़ने की क्षमता को प्रभावित करता है। इसी वजह से ऐसे बच्चों का व्यवहार आम बच्चों से थोड़ा अलग दिखाई देता है। हाल ही में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एम्स की चाइल्ड न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ शेफाली गुलाटी ने बताया कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर और स्क्रीन टाइम के बीच संबंध को लेकर कई रिसर्च सामने आ चुकी हैं, जिनमें ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर को एक अहम कारण माना जा रहा है।
छोटे बच्चों में क्यों बढ़ रहे हैं ऑटिज्म के संकेत?
अध्ययन में यह सामने आया कि जिन बच्चों ने बहुत कम उम्र से ही ज्यादा स्क्रीन टाइम बिताया, उनमें ऑटिज्म से जुड़े लक्षण अधिक देखने को मिले। खासकर एक साल के आसपास जिन बच्चों का स्क्रीन एक्सपोजर ज्यादा था, उनमें आगे चलकर ऐसे संकेत बढ़े हुए पाए गए। तीन साल की उम्र तक लड़कों में ये लक्षण ज्यादा स्पष्ट दिखे, हालांकि लड़कियों में भी इसके संकेत नजर आए। कई रिसर्च और मेटा-एनालिसिस भी यह बताते हैं कि शुरुआती उम्र में लंबे समय तक स्क्रीन देखने से ऑटिज्म का जोखिम बढ़ सकता है।
स्क्रीन टाइम और बढ़ती आदत का असर
डॉक्टर्स के अनुसार, जिन बच्चों को ऑटिज्म है, वे आम बच्चों की तुलना में ज्यादा समय स्क्रीन पर बिताते हैं और उन्होंने बहुत कम उम्र से ही मोबाइल या गैजेट्स का इस्तेमाल शुरू कर दिया होता है। एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि ऐसे बच्चों का "स्क्रीन एडिक्शन स्कोर" ज्यादा होता है, यानी उन्हें स्क्रीन की आदत ज्यादा लग चुकी होती है। इसलिए विशेषज्ञ बार-बार यही सलाह देते हैं कि बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित रखना बेहद जरूरी है, ताकि उनके मानसिक विकास पर नकारात्मक असर न पड़े।
बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना क्यों जरूरी है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के साथ आमने-सामने बातचीत उनके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए बेहद जरूरी है। जितना ज्यादा समय आप बच्चे के साथ बात करने और खेलने में बिताते हैं, उतना ही उसका विकास बेहतर होता है। माता-पिता को सलाह दी जाती है कि स्क्रीन टाइम को एकदम बंद करने के बजाय धीरे-धीरे कम करें। कई गाइडलाइंस में यह भी बताया गया है कि बहुत कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना ही बेहतर होता है।
हर बच्चे को है समान अधिकार
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के साथ संवेदनशील और समझदारी भरा व्यवहार जरूरी है। हर बच्चा, चाहे वह किसी भी स्थिति में हो, सम्मान और अच्छे जीवन का हकदार है। इसलिए ऐसे बच्चों को अलग नजर से देखने के बजाय उन्हें समझने और साथ लेकर चलने की जरूरत है। अगर बच्चे में ऑटिज्म से जुड़े कोई लक्षण नजर आते हैं, तो उसे नजरअंदाज न करें। समय रहते बाल रोग विशेषज्ञ या न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेना जरूरी है, ताकि सही दिशा में इलाज और मार्गदर्शन मिल सके।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



Click it and Unblock the Notifications