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Glaucoma Awareness Month: आंखों की रोशनी छीन सकता है ग्लूकोमा, जानें इसके कारण, लक्षण और बचाव
Glaucoma Awareness Month 2026: ग्लूकोमा या काला मोतिया आंखों से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है। यह बीमारी तब होती है, जब आंखों का इंट्राऑकुलर दबाव बढ़ जाता है। यह बीमारी आंखों की ऑप्टिक नर्व को प्रभावित करती है, जो आंख और दिमाग के बीच संकेत पहुंचाने का काम करती है। इसकी वजह से दृष्टि धुंधली होने लगती है। इसे 'साइलेंट विजन थेफ्ट' कहा जाता है, क्योंकि शुरुआती दौर में इसके लक्षण साफ दिखाई नहीं देते। कई मामलों में तब पता चलता है, जब नुकसान काफी हद तक हो चुका होता है। इसके इलाज में लापरवाही बरतने पर आंखों की रोशनी तक जा सकती है। ग्लूकोमा विश्व स्तर पर अंधेपन का दूसरा प्रमुख कारण है। हालांकि, सही समय पर पता लगाकर इसका इलाज होने पर मरीज पूरी तरह से ठीक हो सकता है। हर साल जनवरी को ग्लूकोमा जागरूकता माह (Glaucoma Awareness Month) के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को ग्लूकोमा, इसके जोखिम कारकों और शीघ्र पहचान के महत्व के बारे में शिक्षित करना है। इस मौके पर इस समस्या के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए हमने डॉ दिग्विजय सिंह, कंसल्टेंट, नेत्र रोग विशेषज्ञ, धर्मशिला नारायणा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली से बातचीत की।

ग्लूकोमा क्यों होता है?
ग्लूकोमा ज्यादातर मामलों में आंख के भीतर दबाव बढ़ने के कारण विकसित होता है। आंख के अंदर एक तरल बनता और निकलता रहता है। जब यह तरल ठीक से बाहर नहीं निकल पाता, तो दबाव बढ़ता है और ऑप्टिक नर्व पर असर डालता है। कुछ मामलों में दबाव सामान्य रहने के बावजूद नर्व को नुकसान पहुंचता है। उम्र बढ़ने के साथ जोखिम बढ़ता है, लेकिन परिवार में पहले से बीमारी होने पर खतरा और ज्यादा देखा जाता है। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल और आंखों की पुरानी चोटों को भी कारणों में गिना जाता है। अगर परिवार में किसी को ग्लूकोमा की समस्या रही हो, तो बिना लक्षणों का इंतज़ार किए नियमित जांच करानी चाहिए, क्योंकि यह बीमारी आमतौर पर 40 वर्ष की उम्र के बाद ज्यादा देखने को मिलती है।
ग्लूकोमा के लक्षण
ग्लूकोमा के शुरुआती लक्षण अक्सर महसूस नहीं होते। ओपन एंगल ग्लूकोमा में नजर का साइड वाला हिस्सा धीरे धीरे कम होता है, जिसे शुरुआत में रोजमर्रा की थकान समझा जाता है। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, सीढ़ियां उतरने में दिक्कत होती है और चीजों से टकराने की शिकायत आती है। कुछ मामलों में अचानक तेज दर्द, आंखों में लालिमा, धुंधला दिखना, सिरदर्द और उल्टी जैसे लक्षण सामने आते हैं। यह स्थिति एंगल क्लोजर ग्लूकोमा में ज्यादा देखी जाती है, जिसे मेडिकल इमरजेंसी माना जाता है।
ग्लूकोमा का इलाज कैसे किया जाता है?
ग्लूकोमा का इलाज नजर को वापस नहीं ला पाता, लेकिन आगे होने वाले नुकसान को रोकता है। इलाज का मुख्य उद्देश्य आंख के अंदर के दबाव को कम करना होता है। शुरुआती स्तर पर आई ड्रॉप्स दी जाती हैं, जिन्हें नियमित रूप से इस्तेमाल किया जाता है। कुछ मामलों में लेजर थेरेपी की मदद ली जाती है, जिससे तरल के बहाव को बेहतर बनाया जाता है। जब दवाओं और लेजर से फायदा नहीं मिलता, तब सर्जरी की जाती है। इलाज लंबे समय तक चलता है और मरीज को लगातार फॉलोअप में रखा जाता है।
नियमित जांच है जरूरी
ग्लूकोमा में सबसे बड़ी चुनौती यही रहती है कि मरीज को लंबे समय तक कोई तकलीफ महसूस नहीं होती। इसलिए नियमित आंखों की जांच को बेहद जरूरी माना जाता है। आंखों का दबाव, ऑप्टिक नर्व की स्थिति और विजुअल फील्ड टेस्ट से बीमारी को समय रहते पकड़ा जाता है। 40 साल के बाद आंखों की जांच को आदत बनाने की सलाह दी जाती है।
क्या ग्लूकोमा से बचाव संभव है?
ग्लूकोमा को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय पर पहचान से गंभीर नुकसान से बचाव किया जाता है। नियमित आंखों की जांच, दवाओं का सही तरीके से इस्तेमाल और बताए गए फॉलोअप को अपनाया जाता है। आंखों की चोट से बचाव किया जाता है, बिना सलाह के स्टेरॉयड दवाओं से दूरी रखी जाती है और डायबिटीज व ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखा जाता है। स्वस्थ जीवनशैली, संतुलित आहार और नियमित व्यायाम को भी आंखों की सेहत से जोड़ा जाता है।
समय पर जांच से नजर बचाई जा सकती है
ग्लूकोमा को अब एक ऐसी बीमारी के रूप में समझा जाता है, जिसमें लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती। समय पर जांच और इलाज से लाखों लोगों की नजर बचाई जा सकती है। यह संदेश बार बार दोहराया जाता है कि आंखों की नियमित जांच सिर्फ चश्मे के नंबर के लिए नहीं, बल्कि नजर बचाने के लिए जरूरी मानी जाती है।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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