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Anant Chaturdashi Vrat Katha: अनंत चतुर्दशी का पावन दिन आज, अनंत फल पाने के लिए करें व्रत कथा का पाठ
Anant Chaturdashi Vrat Katha: विष्णु के अनंत रूपों के पूजन और गणेश विसर्जन के पर्व को अनंत चतुर्दशी कहा जाता है। इस वर्ष 28 सितम्बर को अनंत चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जा रहा है। इस दिन विष्णु अराधना करते हुए व्रत का पालन किया जाता है और श्री हरि विष्णु की पूजा की जाती है। पूजा के साथ साथ व्रत तभी सफ़ल होता है जब अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा पढ़ी जाए। पेश है अनंत चतुर्दशी व्रत कथा -

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा
प्रचीन समय में एक तपस्वी ब्राह्मण थे, जिसका नाम सुमंत और उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उनकी सुशीला नाम की एक सुंदर और धर्मपरायण पुत्री थी। जब सुशीला थोड़ी बड़ी हुई तो उसकी मां दीक्षा की आकस्मिक मृत्यु हो गई। इसके कुछ समय पश्चात उनके पिता सुमंत ने कर्कशा नाम की स्त्री से विवाह कर लिया। कुछ समय बाद ब्राह्मण सुमंत ने अपनी पुत्री सुशीला का विवाह ऋषि कौंडिण्य के साथ करा दिया। विवाह में कर्कशा ने विदाई के समय अपने दामाद को ईंट और पत्थर के टुकड़े बांध कर दे दिए। ऋषि कौडिण्य को कर्कशा का यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, और वे दुखी मन के साथ अपनी सुशीला को विदा कराकर अपने साथ आश्रम लेकर चले गये, और चलते-चलते रात्रि का समय हो गया।

तब सुशीला ने देखा कि संध्या के समय नदी के तट पर सुंदर वस्त्र धारण करके स्त्रियां किसी देवता का पूजन कर रही हैं। सुशीला ने जिज्ञासा से उनसे पूछा तो उन्होंने अनंत व्रत की महत्ता सुनाई, तब सुशीला ने भी यह व्रत किया और पूजा करके चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिण्य के पास आकर उन्हें अनंत व्रत की सारी बात बताई। हालांकि ऋषि ने उस धागे को तोड़ कर आग में डाल दिया। इससे भगवान अनंत का अपमान हुआ। परिणामस्वरुप ऋषि कौंडिण्य दुखी रहने लगे। उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई और वे दरिद्र हो गए।
परेशान होकर एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने उन्हें इस दुख का कारण बताया कि आपने अनंत भगवान का डोरा जलाया है। इसके बाद ऋषि कौंडिण्य को बहुत पछतावा हुआ, और वे अनंत डोरे को प्राप्त करने के लिए वन चले गए। वन में कई दिनों तक भटकने के बाद वे निराश और थककर ज़मीन पर गिर पड़े। तब भगवान अनंत ने उन्हें दर्शन दिया और कहा कि तुमने मेरा अपमान किया, जिसके कारण तुम्हें इतना कष्ट उठाना पड़ा, लेकिन अब तुमने पश्चाताप कर लिया है, मैं प्रसन्न हूं तुम घर जाकर अनंत व्रत को विधि पूर्वक करो। चौदह वर्षों तक व्रत करने से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे और तुम दोबारा संपन्न हो जाओगे। इस प्रकार ऋषि कौंडिण्य ने विधि पूर्वक व्रत किया और उन्हें सारे कष्टों से मुक्ति प्राप्त हुई।
मान्यतानुसार भगवान श्री कृष्ण की सलाह पर युधिष्ठिर ने भी अनंत चतुर्दशी का यह व्रत किया था और इसके बाद पांडवों ने महाभारत का युद्ध जीता और वर्षों तक राज किया।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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