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ईद का त्यौहार इस्लाम धर्म के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। रमजान के पाक़ महीने का अंत जहां ईद-उल-फितर से होता है, वहीं कुछ ही महीनें बाद ईद-उल-अजहा भी आता है।
ईद-उल-अजहा को बकरीद के नाम से भी जाना जाता है। इस ईद को त्याग, समर्पण और कुर्बानी के मूल्यों से जोड़कर मनाया जाता है। ईद उल अजहा का त्यौहार पैगम्बर मोहम्मद और उनके स्समर्पण से संबंधित हैं।
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कब मनाया जाएगा ईद उल अजहा का त्यौहार?

इस्लामी कैलेन्डर के अनुसार, 12 वें माह के ज़ुअल-हज्जा की 10वीं तारीख को बकरीद का त्योहार मनाया जाता है। रोमन कैलेन्डर के अनुसार यह तारीख हर साल बदलती है। यह तारीख ईद उल फितर से 70 दिन बाद की होती है। ईद उल अजहा का चांद 10 दिन पहले ही नजर आ जाता है। अनुमान के मुताबिक़ 19 जून से बकरीद का चाँद दिखना शुरू हो सकता है। ईद उल अजहा इस वर्ष 29 जून को मनाई जा सकती है।
ईद उल अजहा का धार्मिक इतिहास

हज़रत मोहम्मद अल्लाह के पैगम्बर थे। उन्होंने इस्लाम धर्म बुनियाद को मज़बूत करने में अहम् भूमिका निभाई। एक दफ़ा अल्लाह ने पैगम्बर मोहम्मद का इम्तिहान लेने के लिए उनसे उनके ख्वाब में आकर कहा कि वो अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बानी में दे दें। पैगम्बर के जीवन की सबसे प्यारी चीज़ उनका बेटा था। वह अल्लाह के प्रति अपनी श्रद्धा कायम रखने के लिए अपने बेटे की कुर्बानी देने को राज़ी हो गए।
वे अपने बेटे को लेकर कुर्बानी देने जा ही रहे थे कि रास्ते में शैतान मिलें। उस शैतान ने कहा कि अपने बेटे की जगह किसी जानवर की कुर्बानी दी जा सकती है। लेकिन पैगम्बर किसी बेगुनाह जानवर की कुर्बानी के पक्ष में नहीं थे। वे अपने बेटे की ही कुर्बानी के लिए तैयार हुए और अल्लाह के इस काम में पुत्र मोह आड़े ना आए इसके लिए उन्होंने अपने आँखों पर पट्टी बाँध ली।
जैसे ही कुर्बानी के बाद पैगम्बर ने अपनी आँखों से पट्टी हटाई तो उन्होंने देखा कि उनका बेटा सही सलामत खड़ा है और एक बकरे की कुर्बानी हो गई है। दरअसल अल्लाह ने पैगम्बर को इम्तिहान में सफ़ल पाया और उनके बेटे की जान बचाई। पैगम्बर मोहम्मद अल्लाह के लिए अपने जीवन के अनमोल रत्न की कुर्बानी देने को भी तैयार थे।
ईद उल अजहा के पीछे इस धार्मिक कहानी के कारण ही इस त्यौहार को त्याग और समर्पण का पर्व माना जाता है। यह पर्व सिखाता है कि अल्लाह या ईश्वर के प्रति श्रद्धा इतनी हो कि हमें अपना सबकुछ त्यागने में भी झिझक न हो।
समर्पण का रूप होता है ज़कात
इस्लाम धर्म में ज़कात की भी अहम् भूमिका होती है। अल्लाह ने अपने संदेशों में कहा है कि इंसान को अपनी आमदनी का एक हिस्सा ज़रुरतमंदों के लिए रखना चाहिए। इस हिस्से को ज़कात कहा जाता है। ज़कात भी समर्पण का ही रूप होता है, जिसमें अपनी इच्छाओं को अलग रखकर ज़रुरतमंदों को ध्यान में रखने का मूल्य छुपा है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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