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Devshayani Ekadashi Vrat Katha: देवशयनी एकादशी पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, भगवान विष्णु बरसाएंगे कृपा
Devshayani Ekadashi 2026 Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। हर महीने दो एकादशी आती हैं, लेकिन आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी सबसे खास मानी जाती है। इसे हरिशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई, शनिवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, जिसके साथ ही चातुर्मास की शुरुआत होती है। चातुर्मास के चार महीनों के दौरान शादी-विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे शुभ और मांगलिक कार्य करना वर्जित होता है। वहीं, इन चार महीनों में पूजा-पाठ, जप-तप, ध्यान और साधना का विशेष महत्व होता है। देवशयनी एकादशी के दिन भक्तगण व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। पूजा के समय देवशयनी एकादशी की व्रत कथा अवश्य पढ़ें। मान्यता है कि बिना व्रत कथा के पूजा सम्पन्न नहीं मानी जाती। तो आइए, जानते हैं देवशयनी एकादशी की व्रत कथा -

देवशयनी एकादशी व्रत कथा (Devshayani Ekadashi Vrat Katha In Hindi)
पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में राजा मांधाता का शासन था। वे एक न्यायप्रिय और धर्म का पालन करने वाले राजा थे। उनके राज्य की प्रजा सुखी और समृद्ध थी। लेकिन एक समय ऐसा आया जब लगातार तीन साल तक बारिश नहीं हुई। इससे पूरे राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। लोगों को खाने-पीने की परेशानी होने लगी। इस संकट से बचने के लिए प्रजा ने यज्ञ, हवन, कथा, व्रत और अन्य धार्मिक कार्य करने शुरू किए। बाद में सभी लोग अपनी समस्या लेकर राजा मांधाता के पास पहुंचे। प्रजा की बातें सुनकर राजा बहुत दुखी हुए।
राजा सोचने लगे कि वे हमेशा धर्म के अनुसार राज करते हैं और प्रजा की सेवा में भी कोई कमी नहीं रखते, फिर भी उनके राज्य में ऐसा संकट क्यों आया। इसका समाधान जानने के लिए वे एक दिन अपनी सेना के साथ जंगल गए। वहां उन्हें महर्षि अंगिरा का आश्रम मिला। राजा ने ऋषि को प्रणाम किया और अपनी परेशानी बताई।
राजा की बात सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा कि सतयुग में छोटे-से-छोटे पाप का भी बड़ा फल मिलता है। उन्होंने बताया कि इस संकट से छुटकारा पाने के लिए आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत रखें, भगवान विष्णु की पूजा करें, रात में जागरण करें और अगले दिन दान-पुण्य करने के बाद व्रत का पारण करें। इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होंगे और राज्य में फिर से वर्षा होगी।
राजा मांधाता ने महर्षि की बात मानी। उन्होंने आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से किया। अगले दिन दान-पुण्य करने के बाद व्रत का पारण किया। भगवान विष्णु की कृपा से उनके राज्य में अच्छी बारिश हुई, अकाल खत्म हो गया और चारों ओर फिर से सुख-समृद्धि लौट आई।



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