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Guru Purnima Sanskrit Shalok: गुरु की महिमा का गुणगान करते हैं ये अमूल्य संस्कृत श्लोक, शेयर कर कहें धन्यवाद
Guru purnima sanskrit shlok : गुरु पूर्णिमा 2025 इस साल 10 जुलाई को आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि पर मनाई जाएगी। यह दिन गुरु के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने का पर्व है। गुरु को अंधकार में प्रकाश दिखाने वाला दीपक कहा गया है। इस दिन संस्कृत श्लोकों और शुभकामनाओं के माध्यम से गुरु की महिमा का गुणगान किया जाता है।
आप अपने शिक्षक, माता-पिता या जीवन में मार्गदर्शन करने वाले किसी भी व्यक्ति को धन्यवाद कह सकते हैं। मिलकर या पत्र लिखकर उनका आभार प्रकट करें। व्हाट्सएप पर श्लोक और संदेश भेजें, जिससे यह पर्व और खास बने। साथ ही दान-पुण्य करना भी इस दिन शुभ माना गया है। अपने भावों को इन श्लोकों और दोहे से गुरु तक पहुंचाकर इस दिन को यादगार बनाएं।

Guru purnima sanskrit shlok For Teachers (गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं संस्कृत में)
1. सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यिा माम शुचः ।।
अर्थ- सभी साधनों को छोड़कर केवल नारायण स्वरूप गुरु की शरणगत हो जाना चाहिए। वे उसके सभी पापों का नाश कर देंगे। शोक नहीं करना चाहिए।
2. गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु
"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:।।"
अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, जो हमें बनाते हैं; गुरु ही विष्णु हैं, जो हमारा पालन करते हैं; गुरु ही महेश्वर हैं, जो अंधकार को नष्ट करते हैं। गुरु स्वयं परमब्रह्म हैं, उन्हें मेरा प्रणाम।

3. अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नम:।।"
अर्थ: जिस गुरु ने मेरे अज्ञान के अंधेरे को ज्ञान के प्रकाश से दूर किया, उस गुरु को मेरा नमन।
4. गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने। गोबिंद दियो बताय॥
अर्थ- गुरु और गोविंद यानी कि भगवान, एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए - गुरु को अथवा गोविंद को? ऐसी स्थिति में गुरु के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
5. अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थ -जिन्होंने अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान की अंजन-शलाका से दूर किया, उन गुरु को प्रणाम।
6. श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥"
अर्थ -श्रद्धावान, संयमी और तत्पर शिष्य ही ज्ञान प्राप्त कर परम शांति पाता है।
7. अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"
अर्थ -जो समस्त जगत में व्याप्त है, उस परमात्मा तक पहुँचाने वाले गुरु को नमन।
8. यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥
अर्थ -जिसकी गुरु में वैसी ही भक्ति है जैसी ईश्वर में, उसके लिए ज्ञान स्वयं प्रकट होता है।

9. न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः।
तत्त्वज्ञानात्परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"
अर्थ -गुरु से बढ़कर न तत्त्व है, न तपस्या, और न ही तत्त्वज्ञान, उन गुरुदेव को नमन।
10. उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थ -गुरु हमें स्वयं को उठाने और पतन से बचाने की प्रेरणा देते हैं।
11. विद्यां ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
अर्थ - गुरु विद्या देते हैं, विद्या से विनय आती है, विनय से योग्यता, योग्यता से धन और धन से धर्म व सुख मिलता है।
12. दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् ।
गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन ॥
अर्थ- जैसे बिना दूध के गाय, बिना फूल के पेड़, बिना लज्जा के पत्नी, बिना कमल फूल के जल, बिना शम के विद्या और बिना लोगों के शहर शोभा नहीं देते, वैसे ही बिना शिक्षक या गुरु के शिष्य की भी शोभा नहीं है। शिष्य की योग्यता और सफलता उसके शिक्षक पर निर्भर है।
13. आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः ।
यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोसावनुविन्दते ।।
अर्थ- समस्त प्राणियों की, विशेषकर मनुष्य की आत्मा अपने हित-अहित का उपदेशक गुरु है क्योंकि मनुष्य अपने प्रत्यक्ष अनुभव और अनुमान के द्वारा अपने भले-बुरे का निर्णय करने में पूर्णतः समर्थ है
14. तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः
अर्थ- जिसने तीनों लोकों में, चर-अचर में विद्यमान परम चेतन प्रभु के चरणों का मुझे साक्षात्कार करवाया, उन गुरु को नमन है।



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