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भगवान जगन्नाथ जी की मशहूर यात्रा हर साल आषाढ़ महीने के द्वितीया तिथि पर निकाली जाती है। इस विशाल रथ यात्रा के लिए तैयारियां कई महीनों पहले से ही शुरू हो जाती हैं।
साल 2023 की रथ यात्रा का हिस्सा बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु ओड़िशा के पुरी शहर पहुंच चुके हैं। इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं।
जगन्नाथ जी की तैयारी से लेकर यात्रा तक कई तरह की रस्में निभायी जाती हैं। इन सभी रीति रिवाजों का हिस्सा बनने के लिए लोगों में बड़ी उत्सुकता रहती है। आइये इस लेख के माध्यम से जानते हैं कि रथ यात्रा के पहले दिन क्या क्या किया जाता है और किस तरह की रस्में निभाई जाती हैं।

नबजौबन
उस समय भक्तों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता है जब 15 दिन बीमार रहने के बाद उन्हें स्वस्थ भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन का मौका मिलता है।देवस्नान के पश्चात् भगवान बीमार हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि ज्यादा स्नान करने से बच्चों की भांति उन्हें ठंड लग जाती है। इसके बाद उन्हें अलग कमरे में सबसे अलग रखा जाता है, जहां वैद्य उनका उपचार करते हैं। 15 दिन तक गुप्त कमरे में दवा और आराम चलता है। इसके बाद नबजौबन के दिन वो अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए तैयार हो जाते हैं। अपने भगवान को बिल्कुल स्वस्थ देखकर भक्त फूले नहीं समाते हैं। इसके बाद ही उनकी रथ यात्रा के आयोजन की प्रक्रिया शुरू होती है।

पहण्डी बिजे
यह रथ यात्रा की बहुत ख़ास रस्म होती है। इस अनुष्ठान के तहत सेवादार जगन्नाथ प्रभु, भाई बलराम और देवी सुभद्रा को उनके गर्भगृह से उनके संबंधित रथों तक ले जाया जाता है। इस दौरान प्रभु की एक झलक पाने के लिए लाखों की तादाद में लोग इकट्ठा होते हैं। यह नजारा देखने लायक होता है।
पहण्डी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द पदमुंडनम से हुई है, स्थानीय बोली में जिसका अर्थ है पैरों का प्रसार, धीमी गति से चलना। सेवादार बहुत ही विशिष्ट तरिके से सभी मूर्तियों को गर्भ गृह से उनके तैयार रथों तक ले जाते हैं।
'धड़ी पहण्डी' के अनुसार देवताओं को एक ख़ास क्रम में बाहर लाया जाता है- इसमें सबसे पहले सुदर्शन, बलभद्र, देवी सुभद्रा आती हैं और इसके बाद अंत में भगवान जगन्नाथ जी की को लाया जाता है।
भगवान जगन्नाथ और बलभद्र की मूर्तियों का वजन काफी अधिक होता है। ऐसे में एक लकड़ी का क्रॉस उनकी पीठ पर रेशमी रस्सी से बाँधा जाता है। इस अनुष्ठान में में राघव दास मठ द्वारा खूबसूरत मुकुट पेश किये जाते हैं।

ढोल, नगाड़ों, घंटियों और शंख की गूंजती भक्तिमय आवाजों के बीच भगवान सुदर्शन सबसे पहले बाहर आते हैं और रथों का चक्कर लगाते हैं। ऐसा करके वह जात्रा की सभी तैयारियों का मुआयना करते हैं। इसके बाद उन्हें ले जाकर देवी सुभद्रा के रथ दर्पदलन में रखा जाता है।
इसके बाद बड़े भाई बलभद्र का पहण्डी बीजे अनुष्ठान शुरू होता है और उन्हें उनके रथ तालध्वज तक ले जाया जाता है। देवी सुभद्रा को यात्रा के लिए बाहर लाया जाता है और पूरे उत्साह के साथ उन्हें उनके रथ पर बैठाया जाता है। इसके बाद आते हैं सबके प्रिय भगवान जगन्नाथ जिनके पहण्डी बीजे की बेसब्री से प्रतीक्षा हो रही होती है। हर्षोल्लास के साथ और जय जगन्नाथ के जयकारों के साथ उन्हें उनके रथ नंदी घोष तक ले जाया जाता है।
सोने के झाड़ू से होती है ये रस्म
भव्य रथों के तैयार होने के बाद इसकी पूजा के लिए पुरी के गजपति राजा की पालकी आती है। यह पूजा अनुष्ठान 'छर पहनरा' कहलाती है। इस रस्म में शाही परिवार के वंशज सोने की झाडू से रथ के मार्ग को साफ़ करते हैं। इसके साथ ही वह चरों तरफ चन्दन का जल छिड़कते हैं। यह रथ यात्रा की बहुत ही प्रचलित प्रथा है और यह दर्शाता है कि भगवान जगन्नाथ के सामने हर कोई समान है।
चल पड़ती है बहुप्रतीक्षित रथ यात्रा
सभी तरह की रस्मों को पूरा करने के पश्चात् तीनों भाई बहन अपनी मौसी के घर जाने के लिए तैयार होते हैं। रथों में विराजमान होने के बाद हजारों की संख्या में श्रद्धालु रथों को खींचने के लिए मौजूद रहते हैं। पूरी भक्ति और श्रद्धा के साथ जगन्नाथ जी को प्रणाम करते हुए रस्सी खींची जाती है। जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर की दूरी तकरीबन तीन किलोमीटर है। भक्तों की आस्था के साथ साथ उनकी ऊर्जा को बनाये रखने के लिए जगह जगह खाने पीने के स्टॉल लगाए जाते हैं जो ज्यादातर फ्री सेवा देते हैं।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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