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Jagannath Rath Yatra: भगवान जगन्नाथ के साथ गुंडिचा मंदिर क्यों नहीं जाती उनकी पत्नी रुक्मिणी?
भगवान जगन्नाथ जी की यात्रा देश ही नहीं, विदेशों में भी मशहूर है। ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर भारत के चार धामों में से एक है। इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था बहुत अनोखी है।
हर साल आषाढ़ माह में निकलने वाली जगन्नाथ यात्रा का हिस्सा बनने के लिए हजारों की तादाद में लोग पुरी पहुंचते हैं। उनका एक ही मकसद होता है अपने प्रभु जगन्नाथ जी के दर्शन करना और उनके रथ की रस्सी को खींचने का सौभाग्य पाना।

ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचता है वह जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है और मोक्ष की तरफ बढ़ता है। भगवान जगन्नाथ जी के साथ उनकी छोटी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलराम का रथ भी इस यात्रा में निकलता है। मगर एक सवाल सबके मन में जरूर आता है कि इस जात्रा में न तो उनकी पत्नी रुक्मिणी होती हैं और न ही उनकी प्रिया राधा।
इससे जुड़ी एक प्रचलित कथा है। आइये बिना देर किये जानते हैं कि आखिर जगन्नाथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ जी के साथ रुक्मणि और राधा का रथ क्यों नहीं होता है।

श्रीकृष्ण ने नींद में लिया राधा का नाम
इस प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपने महल में सो रहे थे और उनके पास ही उनकी पत्नी रुक्मिणी भी निद्रा अवस्था में थीं। मगर तभी भगवान श्री कृष्ण नींद में ही राधा का नाम पुकारने लगे। इससे रुक्मिणी की नींद खुल गयी और अपने पति के मुख से राधा का नाम सुनकर गुस्सा भी हो गयीं। सुबह होते ही उन्होंने यह बात जाकर अन्य पटरानियों को को कह सुनाई। साथ ही यह भी कहा कि हमारे सेवा, प्रेम और समर्पण के बाद भी स्वामी राधा को याद करना नहीं भूलते हैं।
अपनी शिकायत लेकर रानियां पहुंची माता रोहिणी के पास
भगवान श्रीकृष्ण के मुख से नींद में भी राधा का नाम सुनकर सभी रानियां नाराज थीं और वह इसकी शिकायत करने के लिए माता रोहिणी के पास पहुंची। सभी राधा और श्री कृष्ण की लीला के बारे में माता रोहिणी से जानना चाहती थीं। इस पर माता ने एक शर्त रखते हुए कहा कि वह श्रीकृष्ण-राधा के प्रसंग सुनाएंगी लेकिन इस दौरान कोई भी कमरे के अंदर नहीं आना चाहिए। सभी रानियों ने यह शर्त मान ली और श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा दरवाजे की पहरेदारी के लिए खड़ी हो गयीं।
गलने लगा था श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा का शरीर
देवी रुक्मिणी के साथ साथ अन्य रानियां माता रोहिणी से राधा-कृष्ण की लीला सुनने लगीं। लेकिन तभी सुभद्रा ने अपने भाई बलराम और श्री कृष्ण को कमरे की तरफ आते हुए देखा। सुभद्रा ने बहाना बनाकर उन्हें कमरे में जाने से रोकने का प्रयास किया लेकिन माता रोहिणी की आवाज बाहर तक आ रही थी। राधा-कृष्ण के प्रसंग को तीनों भाई बहन बाहर स्थिर होकर सुनने लगे और इतने अधिक भाव विभोर हो गए कि उनका शरीर ही गलने लग गया।

नारद ने देखा यह रूप
माता रोहिणी द्वारा कहे जा रहे प्रसंग को सुनने से जब श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के शरीर गलने लगे तभी वहां से देवर्षि नारद का गुजरना हुआ। वह इन तीनों के इस अद्भुत रूप को देखकर अभिभूत हो गए। तब नारद मुनि ने तीनों से प्रार्थना की कि यह रूप जिसके दर्शन उन्होंने किये हैं वो भक्तों को भी देखने का अवसर मिल सके। भगवान ने उनकी यह बात मान ले। यही वजह है कि मौजूदा समय में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की अधूरी बनी लकड़ी की प्रतिमाओं के साथ रथयात्रा निकाली जाती है और इसमें उनकी पत्नी रुक्मिणी का रथ शामिल नहीं होता है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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