Latest Updates
-
Jitiya Vrat Katha: जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत में जरूर करें इस कथा का पाठ, पूरे साल सुरक्षित रहेगी संतान -
Jitiya Vrat 2025 Wishes: संतान की लंबी उम्र...जितिया व्रत के अवसर पर अपनों को भेजें ये खास शुभकामना संदेश -
Lal Bahadur Shastri Jayanti 2026: क्या आप जानते हैं लाल बहादुर शास्त्री का असली नाम? जानें 10 रोचक तथ्य -
Gandhi Jayanti 2026: गांधी जी को 'बापू' क्यों कहा जाता है? जानें किसने दी थी 'महात्मा' की उपाधि -
Gandhi Jayanti Wishes 2026: हाथ में लाठी थी...गांधी जयंती पर अपनों को ये खास मैसेज भेजकर दें शुभकामनाएं -
Gandhi Jayanti 2026 Essay, Speech: गांधी जयंती पर ऐसे करें भाषण और निबंध की तैयारी, मिलेगा इनाम -
Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष में खीर बनाते समय न करें ये गलती, नहीं तो नाराज हो सकते हैं पितर, जानें सही विधि -
Koffee With Karan 9: करण जौहर का ‘कॉफी विद करण’ 22 साल बाद होगा खत्म, जानें कब और कहां स्ट्रीम होगा आखिरी सीजन -
Jitiya Vrat 2026: कब है जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत? जानें सही तारीख, और नहाय-खाय से लेकर पारण तक का समय -
लाखों में बिकती है दुनिया की सबसे महंगी कॉफी, लेकिन बनाने का प्रोसेस जानकर फ्री में भी पीने से करेंगे तौबा!
Kabir Ke Dohe: कबीरदास जयंती पर शेयर करें उनके ये फेमस दोहे, जिनमें छिपा है जीवन का सार
Kabir Ke Dohe: संत कबीरदास जयंती हर वर्ष ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2025 में यह शुभ अवसर 11 जून, बुधवार को पड़ेगा। कबीरदास न केवल एक महान संत थे, बल्कि वे समाज सुधारक और युगद्रष्टा कवि भी थे। उनके दोहे सरल शब्दों में गहरी जीवन सीख देने के लिए जाने जाते हैं, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे।
कबीरदास जी ने धर्म, आडंबर, जात-पात और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और लोगों को आत्मचिंतन, सच्चाई और प्रेम का मार्ग दिखाया। उनकी रचनाएं न सिर्फ हिन्दी साहित्य को समृद्ध करती हैं, बल्कि जीवन की दिशा भी तय करती हैं। इस पावन अवसर पर हम आपके साथ कबीर के कुछ ऐसे अमर दोहे साझा कर रहे हैं, जो आज के दौर में भी हमें प्रेरित करते हैं और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीने की सीख देते हैं।

कबीर दास के प्रेरणादायक दोहे (Kabir Das Inspirational Dohe for Life)
1. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥
(अर्थ- कबीर कहते हैं कि जब मैं इस दुनिया में बुराई खोजने गया, तो मुझे कुछ भी बुरा नहीं मिला और जब मैंने खुद के अंदर झांका तो मुझसे खुद से ज्यादा बुरा कोई इंसान नहीं मिला।)
2. धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥
(अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि धैर्य रखें धीरे-धीरे सब काम पूरे हो जाते हैं, क्योंकि अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा।)
3. चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए। वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए।।
(अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि चिंता एक ऐसी डायन है जो व्यक्ति का कलेजा काट कर खा जाती है। इसका इलाज वैद्य नहीं कर सकता। वह कितनी दवा लगाएगा। अर्थात चिंता जैसी खतरनाक बीमारी का कोई इलाज नहीं है।)

4. साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय।।
(अर्थ- कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमें मेरा गुजरा चल जाए, मैं खुद भी अपना पेट पाल सकूं और आने वाले मेहमानों को भी भोजन करा सकूं।)
5. गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय।।
(अर्थ - कबीर दास जी कहते हैं कि शिक्षक और भगवान अगर साथ में खड़े हैं तो सबसे पहलो गुरु के चरण छूने चाहिए, क्योंकि ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता भी गुरु ही दिखाते हैं।)
6. ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोए, औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए
(अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं व्यक्ति को हमेशा ऐसी बोली बोलनी चाहिए जो सामने वाले को अच्छा लगे और खुद को भी आनंद की अनुभूति हो।)
7. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।
(अर्थ- जिस प्रकार खजूर का पेड़ इतना ऊंचा होने के बावजूद आते-जाते राही को छाया नहीं दे सकता है और उसके फल तो इतने ऊपर लगते हैं कि आसानी से तोड़े भी नहीं जा सकते हैं। उसी प्रकार आप कितने भी बड़े आदमी क्यों न बन जाए लेकिन आपके अंदर विनम्रता नहीं है और किसी की मदद नहीं करते हैं तो आपका बड़ा होने का कोई अर्थ नहीं है।)
8. माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय। इक दिन ऐसा आएगा, मै रौंदूंगी तोय।।
(अर्थ- मिट्टी कुम्हार से कहती है, तुम मुझे क्यों रौंदते हो, एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुम्हें रोंदूंगी, अर्थाक मृत्यु के बाद शरीर मिट्टी में मिल जाता है।)
9. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।
(अर्थ- ज्ञान केवल किताबों में नहीं होता है, बल्कि प्रेम और करुणा में भी होता है, जो व्यक्ति प्रेम को समझ लेता है, वही सच्चा पंडित होता है।)
10. माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।
(अर्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि बाहरी दिखावा, जैसे कि माला फेरने से कुछ नहीं होता जब तक कि मन शांत न हो जाए. इसलिए, व्यक्ति को हाथ की माला को छोड़ कर मन में ध्यान लगाना चाहिए)



Click it and Unblock the Notifications
