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Papmochani Ekadashi Katha: आज जरूर करें इस कथा का पाठ, मिलेगा पापमोचनी एकादशी का पूरा फल
Papmochani Ekadashi Vrat Katha: प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को पापमोचनी एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह खास दिन भगवान विष्णु नारायण को समर्पित है। मान्यता है कि विशेष विधि विधान से पूजा अर्चना करने पर सारे पापों से मुक्ति मिलती है तथा शुभ फल की प्राप्ति होती है।
सनातन धर्म के प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु नारायण की विशेष विधिवत से पूजा अर्चना करने का विधान है। इसी प्रकार से हर वर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी मनाई जाती है। पंचांग के मुताबिक इस वर्ष 5 अप्रैल दिन शुक्रवार को पापमोचनी एकादशी मनाई जाएगी।

इस पावन पर्व पर जगत के पालन हार भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक पापमोचनी एकादशी के दिन उपवास रखने से संपूर्ण पापों से मुक्ति मिलती है इसके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य में वृद्धि होती है। इस खास व्रत के दिन पाप मोचनी एकादशी व्रत की कथा का पाठ करना बहुत ही शुभ माना जाता है। आइए विस्तार पूर्वक जानते हैं पापमोचनी एकादशी का शुभ मुहूर्त और व्रत कथा।
कब है पापमोचनी एकादशी 2024? (Papmochani Ekadashi 2024 Date and SHubh Muhurat)
हिंदू धर्म के द्रिक पंचांग के मुताबिक इस वर्ष पापमोचनी एकादशी 4 अप्रैल दिन गुरुवार सायं काल 04:14 मिनट से प्रारंभ होगा और अगले दिन यानी 5 अप्रैल दिन शुक्रवार को दोपहर 01:28 मिनट पर इसकी समाप्ति होगी। उदया तिथि के मुताबिक मुख्य रूप से पापमोचनी एकादशी 5 अप्रैल दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी।
पापमोचनी एकादशी व्रत की कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha)
पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं पांडु पुत्र अर्जुन को पाप मोचनी एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया था। मान्यताओं के अनुसार राजा मांधाता ने एक लोमस ऋषि से सवाल पूछा कि जाने अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति कैसे मिलती है। तब राजा के सवालों का जवाब देते हुए लोमस ऋषि ने पापमोचनी एकादशी व्रत के बारे में एक पौराणिक कथा सुनाई थी। कथा के मुताबिक एक बार च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी वन में घोर तपस्या कर रहे थे। उस दौरान मंजुघोषा नामक एक अप्सरा वहाँ से गुजर रही थी। तभी उस अप्सरा की नजर ऋषि के पुत्र मेधावी पर पड़ी। वह अप्सरा मेधावी पर मोहित हो गई। इसके पश्चात अप्सरा मेधावी को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अनेकों प्रयास करने लगी।
उस दौरान कामदेव भी मंजुघोषा की मदद करने के लिए आ गए। जिसके कारण मेधावी मंजुघोषा के प्रति आकर्षित हो गया। वह भगवान शिव की तपस्या करना भूल गया और तपस्या भंग हो गई। कुछ समय बाद जब मेधावी को अपने द्वारा हुई गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने मंजुघोषा को पापी मानकर उनको पिशाचिनी का श्राप दे दिया, जिससे अप्सरा बहुत ही दुखी हुई।
तत्पश्चात् अप्सरा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने क्षमा मांगी। मंजुघोषा की क्षमा याचना को सुनकर मेधावी ने दया दिखाते हुए उनको चैत्र माह के पापमोचनी एकादशी के बारे में बताया। मंजुघोषा ने मेधावी के बताए अनुसार पापमोचनी एकादशी का व्रत विधि विधान से किया। पापमोचनी एकादशी व्रत रखने से मंजुघोषा को जाने अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिल गई। इस व्रत के पश्चात मंजुघोषा फिर से अप्सरा बन गई और स्वर्ग लोक पर वापस चली गई। मंजुघोषा के बाद मेधावी ने भी पापमोचनी एकादशी व्रत रखा तथा अपने पापा को दूर किया और फिर से तपस्या में लीन हो गए।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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