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Sakat Chauth Vrat Katha: सकट चौथ व्रत में करें इस कथा का पाठ, हर मनोकामना होगी पूरी
Sakat Chauth Vrat Katha: हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सकट चौथ का व्रत रखा जाता है। इस वर्ष यह व्रत 6 जनवरी को रखा जाएगा। सकट चौथ का व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है। इस दिन व्रत रखने और गणेश जी की पूजा-अर्चना करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि आती है। महिलाएं इस दिन व्रत रखकर संतान की दीर्घायु और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सकट चौथ का व्रत करने से जीवन में आने वाले कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन शुभ मुहूर्त में भगवान गणेश की पूजा करने के साथ-साथ सकट चौथ की कथा सुनी जाती है। फिर रात में चंद्र देव की पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है। तो आइए जानते हैं सकट चौथ की व्रत कथा -

सकट चौथ व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक साहूकार और उसकी पत्नी रहते थे। वे दोनों धर्म-कर्म, दान-पुण्य और व्रत-उपवास पर विश्वास नहीं करते थे। उनके कोई संतान भी नहीं थी, इसलिए वे मन ही मन दुखी रहते थे। एक दिन साहूकारनी अपने पड़ोस में रहने वाली महिला के घर गई। उस दिन सकट चौथ का व्रत था। पड़ोसन भगवान गणेश और सकट चौथ की पूजा कर रही थी। साहूकारनी ने पूछा कि तुम क्या कर रही हो। पड़ोसन ने बताया कि आज सकट चौथ का व्रत है। इस व्रत को करने से संतान सुख, धन और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
यह सुनकर साहूकारनी ने मन ही मन कहा कि यदि मुझे संतान हुई तो मैं सकट चौथ का व्रत रखूंगी और तिलकुट चढ़ाऊंगी। भगवान गणेश ने उसकी प्रार्थना सुन ली और कुछ समय बाद वह गर्भवती हो गई। गर्भवती होने पर उसने फिर मनौती मानी कि यदि पुत्र हुआ तो वह और अधिक तिलकुट चढ़ाएगी। कुछ समय बाद उसे पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके बाद उसने कहा कि जब उसके बेटे का विवाह हो जाएगा, तब वह बड़ी मात्रा में तिलकुट चढ़ाएगी। भगवान गणेश की कृपा से बेटे का विवाह भी तय हो गया।
लेकिन इतना सब होने के बाद भी साहूकारनी ने अपनी कही हुई मनौती पूरी नहीं की। इससे सकट देवता क्रोधित हो गए। विवाह के समय जब लड़का फेरे ले रहा था, तभी सकट देवता उसे उठाकर पीपल के पेड़ पर बैठा देते हैं। लड़का अचानक गायब हो गया। सभी लोग उसे ढूंढने लगे, लेकिन वह कहीं नहीं मिला। हारकर सभी अपने-अपने घर लौट गए।
जिस लड़की से उसका विवाह होने वाला था, वह एक दिन अपनी सहेलियों के साथ पूजा के लिए जंगल गई। वहां उसे पीपल के पेड़ से आवाज सुनाई दी - "ओ मेरी अर्धब्याही।" यह सुनकर वह डर गई और घर आकर अपनी मां को सारी बात बता दी। लड़की की मां पीपल के पेड़ के पास गई तो देखा कि वहां उसका होने वाला दामाद बैठा है। उसने उससे पूछा कि तुम यहां क्यों बैठे हो। तब लड़के ने बताया कि उसकी मां ने सकट चौथ पर तिलकुट चढ़ाने की मनौती मानी थी, लेकिन उसे पूरा नहीं किया। इसी कारण सकट देवता नाराज हो गए हैं।
यह सुनकर लड़की की मां साहूकारनी के पास गई और उससे पूरी बात पूछी। तब साहूकारनी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सच्चे मन से भगवान सकट चौथ से प्रार्थना की और वचन दिया कि यदि उसका बेटा सुरक्षित घर लौट आया, तो वह पूरी श्रद्धा से तिलकुट चढ़ाएगी। भगवान गणेश और सकट देवता ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और लड़के को वापस भेज दिया। इसके बाद बेटे का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ और बहू-बेटा सकुशल घर आ गए।
तब साहूकारनी ने पूरे नियम-विधान से तिलकुट चढ़ाया और सकट चौथ का व्रत किया। उसने संकल्प लिया कि अब वह हर वर्ष श्रद्धा से सकट चौथ का व्रत करेगी। इस कथा के बाद पूरे नगर में सकट चौथ का व्रत और तिलकुट चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई।
हे सकट चौथ भगवान जिस तरह से आपने साहूकारनी को बेटे-बहू से मिलवाया, वैसे ही हम सब को मिलवाना और इस कथा को कहने सुनने वालों का भला करना। बोलो सकट चौथ की जय। श्री गणेश देव की जय।



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