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क्या है नमाज़ पढ़ने का असली मकसद
यह रमज़ान का मुबारक़ महीना चल रहा है। रमजान इस्लामी महीने का नौवां महीना है। इसका नाम भी इस्लामिक कैलेंडर के नौवें महीने से बना है। यह महीना इस्लाम के सबसे पाक महीनों में शुमार किया जाता है। इस महीने में इस्लाम को मानने वाले अनुयाईयों को रोज़े रखने की हिदायत दी गयी है।
रोज़े रखने का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं कि आप भूखे प्यासे रहें, बल्कि इस मुबारक़ महीने में आपको सारे गिले शिक़वे भुला कर, समाज में दोस्ती और एकता क़ायम करने कि सलहा दी गयी है। यही नहीं इस पाख महीने में रोज़े दार किसी तरह का अश्लील या गलत काम करने से भी बचें। इसके साथ ही उन्हें ग़रीबों और जो बेसहारा हैं उनकी मदद करने को भी कहा गया है। रमजान के वक्त पेट में गैस बनने लगे तो करें ये उपाय

नामाज़ या सलाह नमाज फारसी शब्द है, जो उर्दू में अरबी शब्द सलात का पर्याय है। कुरान शरीफ में सलात शब्द बार-बार आया है और प्रत्येक मुसलमान स्त्री और पुरुष को नमाज पढ़ने का आदेश ताकीद के साथ दिया गया है। रमज़ान के मुबारक महीने रोज़े रखने के साथ, पांच बार की नमाज़ अदा करना भी जरुरी है। नमाज के मुताल्लिक उलैमा इकराम लिखते हैं कि, "हर नमाज ऐसे अदा करो जैसे कि यह तुम्हारी आखिरी नमाज हो।" इससे यह पता चलता है कि इस्लाम में नमाज़ का क्या महत्व है। इस्लाम में पांच वक्त की नमाज़ फर्ज़ है, यानि पांच बार नमाज़ पढ़ना जरूरी है।
नमाज़ इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है। नमाज़ जिंदगी में परहेज़गारी लाती है, यानि नमाज़ पढ़ने वाला कभी भी ग़लत और हराम काम नहीं कर सकता। जो मुस्लमान पांच बार कि नमाज़ पढ़ते हैं, ज़िंदगी में वह कभी किसी कि बुराई, किसी के गलत काम में उसका साथ और ऐसा कुछ नहीं बोलते हैं जिससे किसी का दिल दुखे। रमज़ान के दौरान रोज़े रखने का महत्व
इसके साथ ही नमाज़ अल्लाह से मांगने का ज़रिया है। इस माह रोज़े रख कर मुस्लमान अल्लाह की इबादद करते हैं और महीने के खत्म होने पर ईदुल फितर का त्योहार मनाते हैं। जिसमें परिवार के सभी लोग सुबह नमाज़ पढ़ कर अल्लाह का शुक्रिया करते हैं। और फिर अपने परिवार के साथ बड़ी ही धूम धाम से ईद का पर्व मानते हैं।



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