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Janaki Jayanti: इन मंत्रों और कथा के पाठ से पाएं श्री राम और माता सीता का आशीर्वाद
फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जानकी जयंती मनायी जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन माता जानकी यानी सीता माता प्रकट हुई थीं। माता सीता अपने त्याग, समर्पण और स्त्री धर्म के लिए जानी जाती हैं। जानकी जयंती के दिन सुखद दाम्पत्य जीवन की मनोकामना पूर्ण करने के लिए व्रत का पालन किया जाता है। व्रत के पूर्ण होने पर माता सीता और श्री राम की विशेष पूजा अर्चना की जाती है और माता जानकी की कथा पढ़ी या सुनी जाती है। विवाहित महिलाओं के लिए ये दिन विशेष महत्व रखता है। जानते हैं क्या है जानकी जयंती की व्रत कथा और मंत्र जिनके जाप से आपको मिलेगा प्रभु श्री राम और माता सीता का आशीर्वाद-

जानकी जयंती के मन्त्र
- श्री सीतायै नम:।
- श्रीरामचन्द्राय नम:।
- श्री रामाय नम:।
- ॐ जानकीवल्लभाय नमः।
- श्रीसीता-रामाय नम:।

माता जानकी की जन्म कथा
ऋषि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के अनुसार एक बार मिथिला राज्य में भयंकर सूखा पड़ा और राजा जनक ने परेशान होकर इस समस्या के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया। ऋषि ने यज्ञ संपन्न किया और धरती पर हल चलवाया। राजा जनक ने हल चलाना शुरू किया और फिर उन्हें धरती के भीतर एक खुबसूरत संदूक मिला, जिसके अंदर एक सुंदर कन्या थी। राजा जनक की तब कोई संतान नहीं थी। उस कन्या को हाथ में लेते ही राजा जनक को पितृप्रेम की अनुभूति हुई। जनक जी ने उस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। ये कन्या कोई और नहीं बल्कि माता सीता थीं।

एक अन्य प्रचलित कथा
माता सीता के जन्म से जुड़ी एक और प्रचलित कथा है। इसके अनुसार माता सीता लंकापति रावण और मंदोदरी की पुत्री है। सीता जी वेदवती नाम की एक स्त्री का पुनर्जन्म थीं। वेदवती श्रीहरी विष्णु की परमभक्त थी और उन्हें पति के रूप में पाना चाहती थी। अपनी इस मनोकामना के लिए उन्होंने कठोर तप शुरू किया। मान्यता अनुसार एक दिन रावण ने वन में वेदवती को तपस्या करते देखा और उसकी सुन्दरता पर मोहित हो गया। उसने वेदवती देवी को अपने साथ चलने को कहा जिससे देवी ने इनकार कर दिया। जब रावण ने दुर्व्यवहार किया तब देवी ने स्वयं को भस्म करते हुए रावण को श्राप दिया कि वह उसकी पुत्री के रूप में जन्म लेंगी और उसकी मृत्यु का कारण बनेंगी।
कुछ दिनों पश्चात मंदोदरी ने एक कन्या को जन्म दिया। परन्तु श्राप के भय से रावण ने जन्म लेते ही उस कन्या को सागर में फेंक दिया। सागर की देवी वरुणी ने उस कन्या को देवी पृथ्वी को सौंपा और पृथ्वी ने उस कन्या को राजा जनक और माता सुनैना की गोद में दिया।
आगे चलकर देवी वेदवती का वह श्राप सच हुआ और रावण की मौत का कारण उसके द्वारा किया गया माता सीता का अपहरण ही बना।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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