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जीवन को बदल सकती है महादशा
पश्चिमी ज्योतिष की तुलना में वैदिक ज्योतिष अधिक प्रभावशाली और असरकारी होता है। क्योंकि वैदिक ज्योतिष में अन्य की तुलना में कई तरह की तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।
पश्चिमी ज्योतिष की तुलना में वैदिक ज्योतिष अधिक प्रभावशाली और असरकारी होता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष में अन्य की तुलना में कई तरह की तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। वैदिक ज्योतिष को सबसे अधिक प्रभावशाली बनाने वाली तकनीकों में से एक है महादशा प्रणाली।
असल में संत पाराशर ने अपने शिष्य संत मैत्रय को ये कठिन प्रणाली सिखाई थी। अत्यधिक जटिल होने के कारण हम यहां गणना की पद्धति के बारे में नहीं बता रहे हैं लेकिन फिर भी हम आपको आसान तरीके से महादशा का पूरा सिद्धांत समझाते हैं।

वैदिक ज्योतिष में नौ ग्रह हैं। इसके अलावा सहायक ग्रह अरुण, वरुण और प्लूटो भी होता है। साथ ही सहायक बिंदु को मंडी के नाम से जाना जाता है। वैदिक ज्योतिष में मुख्य रूप से सब कुछ नवग्रहों पर निर्भर करता है। नवग्रहों में सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, राहू और केतु शामिल हैं। राहू और केतु छाया ग्रह हैं जिनका कोई शारीरिक अस्तित्व नहीं है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मनुष्य के जीवन पर इन ग्रहों का प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक समय अवधि को महादशा के रूप में जाना जाता है। महादशा को कई भागों में बांटा गया है जैसे अंर्तदशा, प्रत्यंतर दशा और सूक्ष्म दशा।
कैसे होती है महादशा की गणना
संपूर्ण दशा को एकसाथ जोड़ने पर 120 सालों का जोड़ बनता है। अत: ज्योतिष के अनुसार मनुष्य का जीवनकाल 120 वर्षों का माना गया है। दशा की कुल अवधि 120 वर्ष है। अत: पूरे 120 वर्षों को विभिन्न ग्रहीय समय अवधि में बांटा गया है।
वैदिक ज्योतिष में वरुण, अरुण और नेप्ट्यून ग्रह को महत्व नहीं दिया गया है इसलिए इन ग्रहों के लिए कोई दशा नहीं है। आपके जन्म के समय चंद्रमा विशेष नक्षत्र में होता है। जन्म के समय नक्षत्र का स्वामी ही दशा स्वामी होता है।
उदाहरणार्थ, मान लीजिए कि आपका जन्म अश्विनी नक्षत्र में हुआ है तो इस प्रकार अश्विनी का स्वामी केतु है। अत: जन्म के समय आपकी केतु की दशा चल रही होगी।
नक्षत्र एवं उनके स्वामी
- सूर्य की दशा
- चंद्रमा की दशा
- मंगल की दशा
- राहू की दशा
- गुरु की दशा
- शनि की दशा
- बुध की दशा
- केतु की दशा
- शुक्र की दशा
अगर आपका जन्म शुक्र की दशा में हुआ है तो आपकी अगली दशा सूर्य की होगी। सूर्य के पश्चात् आपकी चंद्रमा की दशा शुरु होगी और इसी क्रमानुसार दशा में परिवर्तन होता रहेगा। अंर्तदशा का अनुक्रम भी महादशा की तरह ही है लेकिन पहली अंर्तदशा स्वयं महादशा के ग्रह पर निर्भर करती है।
सूर्य की दशा में अनुक्रम इस प्रकार होगा,
- सूर्य-सूर्य की दशा
- सूर्य-चंद्रमा की दशा
- सूर्य-मंगल की दशा
- सूर्य-राहु की दशा
- सूर्य-गुरु की दशा
- सूर्य-शनि की दशा
- सूर्य-बुध की दशा
- सूर्य-केतु की दशा
- सूर्य-शुक्र की दशा
और जब चंद्रमा की दशा होगी तब पहली दशा और अंर्तदशा स्वयं चंद्रमा की होगी।
- चंद्रमा-चंदमा की दशा
- चंद्रमा-मंगल की दशा
- चंद्रमा-राहु की दशा
- चंद्रमा-गुरु की दशा
- चंद्रमा-शनि की दशा
- चंद्रमा-बुध की दशा
- चंद्रमा-केतु की दशा
- चंद्रमा-शुक्र की दशा
- चंद्रमा-सूर्य की दशा
- मंगल-मंगल की दशा
- मंगल-राहु की दशा
- मंगल-गुरु की दशा
- मंगल-शनि की दशा
- मंगल-बुध की दशा
- मंगल-केतु की दशा
- मंगल-शुक्र की दशा
- मंगल-सूर्य की दशा
- मंगल-चंद्रमा की दशा
मान लीजिए कि आपकी गुरु की महादशा और केतु की अंर्तदशा चल रही है। गुरु की महादशा और अंर्तदशा का स्वामी होता है। गुरु की महादशा की कालअवधि 16 वर्षों की होती है। इसके बाद खुद जान सकते हैं कि गुरु और केतु किस घर में गोचर करेंगें। उस भाव के फल के बारे में जानें। भाव के संबंधित फल के अनुसार ही आपको दशा के दौरान ग्रह का प्रभाव मिलेगा।
इसलिए ग्रह और भावों की विशेषताओं और गुणों के बारे में जानना जरूरी होता है। ज्योतिष के बारे में जानने के लिए भाव और ग्रहों का अध्ययन बहुत जरूरी होता है।
ये कुछ अशुभ महादशा है किंतु ये 100 प्रतिशत सत्यय और सही नहीं हो सकती हैं।
दूसरे और सातवें भाव को मारक और मृत्यु का भाव कहा जाता है इसलिए इन भावों की दशा थोड़ा कठिन फल दे सकती है। ज्योतिष में 3 भाव छठा, आठवां और बारहवां भाव अशुभ माने जाते हैं। इन भावों के दशा के स्वामी भी अशुभ फल दे सकते हैं।
कुछ दशा आपके जीवन को पूरी तरह से बदल सकती हैं। केतु की दशा में आप अपने जीवन के आध्यात्मितक पहलू की पहचान करते हैं। बुध की दशा में उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं। शुक्र की दशा में आप कामुक जीवनशैली के प्रति आकर्षित रहते हैं।
महादशा को अंर्तदशा, प्रत्यंतर दशा और सूक्ष्म दशा में विभाजित किया गया है।
जन्म के समय दशा के संतुलन की जानकारी
अपनी रिपोर्ट में आपको सबसे ऊपर जन्म के समस चल रही दशा के बारे में बताया जाएगा। आपके पिछले जन्म में मृत्यु के समय चल रही दशा के बाद आपके जीवन में नई दशा की शुरुआत होती है। इस प्रकार संतुलित दशा बनती है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारा जीवन एक चक्र है। मृत्यु के बाद भी ये चक्र समाप्त नहीं होता। मृत्यु के पश्चात् आत्मा नए शरीर में प्रवेश कर लेती है। पिछले जन्म के कर्मों के साथ ही हम अपने नए जीवन की शुरुआत करते हैं। ये एक जटिल प्रक्रिया है और वैज्ञानिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की गई है। भाग्य में जो लिखा है मनुष्य को उसे भोगना हर पड़ता है।
ज्योतिष के अनुसार महादशा एक विशेष समय अवधि में मनुष्य के जीवन को दिशा देती है। अगर दशा का स्वामी करियर के भाव में बैठा है तो इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में आपको अपने करियर में कई अवसर प्राप्त होंगें। अगर दशा स्वामी घर और परिवार के भाव में बैठा है तो आपको रियल एस्टेट में कई अवसर मिल सकते हैं। अपने भविष्य के बारे में जानने के लिए महादशा की जानकारी होना बहुत जरूरी है।



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