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आज से श्राद्ध शुरु... 19 सितम्बर तक रहेंगे पितृपक्ष, जाने हिंदू धर्म में पितृपक्ष की महत्ता ..
5 सितम्बर 2017 यानी आज से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहे हैं। पितृपक्ष में पितृगण का श्राद्ध तर्पण करने से पितर प्रसन्न होकर शुभ फल देते हैं। यही नहीं इससे परिवार में सुख शांति रहती है।
आइए जानते कुछ ऐसी बातों के बारे में जिनका पितृपक्ष के दौरान खास ध्यान रखना चाहिए। पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है।

तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से जानते हैं।

19 सितम्बर तक रहेगा..
भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से पितरों का दिन प्रारंभ हो रहा है जो अमावस्या तिथि तक रहेगा। मंगलवार यानी आज से पितृ पक्ष शुरू हो रहे हैं। 19 सितंबर को अमावस्या एवं चतुर्दशी का श्राद्ध होगा। जबकि अन्य श्राद्ध क्रम से ही होंगे। ज्योतिषों के अनुसार अपराह्न व्यापिनी तिथि में ही श्राद्ध करना चाहिए।

श्राद्ध से इस समय होगा शुरु और खत्म
छह सितंबर को प्रतिपदा का श्राद्ध होगा। इस दिन प्रतिपदा तिथि दिन में 12.20 मिनट पर आरंभ होगी। 19 सितंबर को प्रात: 11.42 मिनट के पश्चात अमावस्या तिथि प्रारंभ होगी। इस दिन चतुर्दशी एवं अमावस्या का श्राद्ध होगा। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण अमावस्या (16 दिन) तक पितरों का तर्पण करना चाहिए।

हिंदू धर्म में मान्यता
हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत के रूप में इस संसार में ही रह जाता है।

पितृ पक्ष का महत्त्व
ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें।

सार्वजानिक स्थलों पर किया जाता है श्राद्ध
श्राद्ध में दूध, दही और घी पितरों के लिए विशेष तुष्टिकारक माने जाते हैं। श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि में कभी नहीं किया जाता है। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है।

पूर्णिमा श्राद्ध विधि:
गाय के दूध में पकाए हुए चावल में शक्कर, इलायची, केसर व शहद मिलाकर खीर बनाएं। गाय के गोबर के कंडे को जलाकर पूर्ण प्रज्वलित करें। प्रज्वलित कंडे को किसी बर्तन में रखकर दक्षिणमुखी होकर खीर से तीन आहुति दें। सर्वप्रथम गाय, काले कुत्ते व कौए हेतु ग्रास अलग से निकालकर उन्हे खिलाएं, इनको ग्रास डालते हुए याद रखें कि आप का मुख दक्षिण दिशा की तरफ ही साथ ही जनेऊ (यज्ञोपवित) सव्य (बाई तरह यानि दाहिने कंधे से लेकर बाई तरफ होना चाहिए।। इसके पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराएं फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें। पश्चात ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें।

12 प्रकार के श्राद्ध का वर्णन..
- नित्य श्राद्ध
- नैमित्तिक श्राद्ध
- काम्य श्राद्ध
- वृद्धि श्राद्ध
- सपिंडन श्राद्ध
- पार्वण श्राद्ध
- गोष्ठ श्राद्ध
- शुद्धि श्राद्ध
- कर्मांग श्राद्ध
- दैविक श्राद्ध
- औपचारिक श्राद्ध
- सांवत्सरिक श्राद्ध



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