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पुत्रदा एकादशी आज, जानें इससे जुड़ी कथा
एक बार युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण से श्रावण मास में पड़ने वाली एकादशी का महत्व पूछा था तब स्वयं भगवान ने उन्हें इस एकादशी के महत्व के साथ साथ इससे मिलने वाले लाभ के बारे में भी उन्हें बताया था। उन्होंने कहा कि श्रावण शुक्ल एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। वैसे तो सभी एकादशियां बहुत ही महत्वपूर्ण होती हैं लेकिन पुत्रदा एकादशी सबसे ज़्यादा लाभ प्रदान करने वाली एकादशी मानी जाती है। इस एकादशी की कथा कुछ इस प्रकार है।

सुकेतू, भद्रावती के राजा
राजा सुकेतू भद्रावती नाम के एक राज्य के राजा थे। उनकी पत्नी का नाम रानी शैव्या था। उनका जीवन सभी सुख सुविधाओं से भरा हुआ था लेकिन फिर भी संतान की कमी उन्हें दिन रात खाये जा रही थी। राजा और रानी को दिन रात चिंता सताती कि आखिर उनके बाद सारे राज्य का कार्यभार कौन संभालेगा। लोग कहते थे कि जो अपने पुत्र को बड़ा होते देखते हैं उनका जीवन बड़ा ही सुखमय बन जाता है। इतना ही नहीं लोगों का मानना था कि जिनके पुत्र होते हैं उनका जीवन मृत्यु के बाद सफल हो जाता है और जिनके पुत्र नहीं होता उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं होता।
जब राजा पहुंचे जंगल
लोगों की इस तरह की बातें दिन रात राजा को परेशान करती। एक दिन विवश होकर राजा ने अपने प्राण त्यागने का निश्चय किया। हालांकि, जब उन्हें इस बात का स्मरण हुआ कि आत्महत्या पाप होता है तो उन्होंने ऐसी गलती न करने का संकल्प लिया। इन्हीं सब चिंताओं से घिरे राजा सुकेतू एक दिन जंगल में पहुंच गए। वहां की ख़ूबसूरती और शांति ने राजा को मन्त्रमुग्ध कर दिया और वे अपने ही ख्यालों में खोये जंगल में यहां वहां घूमने लगे। चिड़ियों की चहक और जंगल के उस सुन्दर दृश्य ने राजा को जैसे वहीं बांध लिया था।
अचानक सुकेतू को प्यास लगी और पानी के लिए वे नदी की खोज करने लगे। कुछ दूर चलते ही राजा को नदी मिल गयी परन्तु जैसे ही पानी पीने के लिए वे आगे बढ़ें उन्हें कुछ क़दमों की आहट सुनाई दी। उन्होंने फ़ौरन मुड़ कर देखा तो वहां कुछ साधू थे जो अपने आश्रम की ओर जा रहे थे उन्हें देखते ही सुकेतू को पता चल गया था कि वे कोई साधारण साधू नहीं थे बल्कि वे दिव्य आत्माएं थी।
सुकेतु साधुओं से मिले
उन दिव्य साधुओं को देखकर राजा के मन में एक आस जगी और बिना समय व्यर्थ किये वे फ़ौरन उनके पास पहुंच गए और अपने घुटनों के बल बैठकर उन सभी का अभिनन्दन किया। एक राजा को ऐसा देख सभी साधू बड़े ही प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा से अकेले जंगल में आने का कारण पूछा। यह सुनकर राजा की आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी और उन्होंने अपना सारा दुःख उन साधुओं को बताया।
उन्हीं में से एक साधू ने राजा को ढांढस बंधाया और कहा कि वे उनसे बहुत ही प्रसन्न है और उनकी इच्छा ज़रूर पूरी होगी। इस पर राजा ने उन साधुओं से पूछा कि आखिर वे लोग कौन हैं और इस जंगल में क्या कर रहे हैं। तब उन साधुओं ने राजा को बताया कि वे लोग विश्वदेव श्रेणी के साधू हैं जो पुत्रदा एकादशी के पवित्र अवसर पर नदी में स्नान के लिए आए हैं।
उन्होंने राजा को बताया कि जो भी व्यक्ति पुत्रदा एकादशी पर व्रत और पूजन करता है भगवान उसे पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
राजा को हुई पुत्र की प्राप्ति
साधुओं की बात सुनकर राजा ने फ़ौरन ही पुत्रदा एकादशी का व्रत और पूजन करने का निर्णय लिया। उन्होंने साधुओं का आभार व्यक्त किया और वहां से अपने महल वापस लौटने की अनुमति मांगी। महल पहुंचकर सुकेतू ने अपनी रानी को सारी बात बताई और दोनों ने मिलकर पूरे विधि विधान से पुत्रदा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की और साथ ही व्रत भी रखा।
दोनों ने विष्णु जी से आशीर्वाद के रूप में एक पुत्र की कामना की। उसी वर्ष रानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। इस तरह से पुत्रदा एकादशी, जो श्रावण शुक्ल एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, ने राजा और रानी की इच्छा को पूर्ण किया। ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी की कथा सिर्फ सुनने या पढ़ने से ही भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त हो जाती है।



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