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इस्लाम में मांसाहार के बारे में चौकानें वाले तथ्य
इस्लाम धर्म को लेकर आधुनिक समय में कई सैद्धान्तिक मतभेद हैं। इस्लाम धर्म के अनुयायियों का मानना है कि उनका धर्म बहुत सच्चा है लेकिन कई बार बात सार को समझने में समस्या होती है। इस आर्टिकल में हम आपको इस्लाम धर्म के एक पहलू के बारे में बात करेगें, जो उनके मांसाहार के बारे में विचार को दर्शाता है। इस्लाम धर्म में मांसाहार के बारे में कई चौकानें वाले तथ्यों को बयां किया गया है, जो आपको उनके मांसाहारी होने के नजरिए को परिवर्तित कर सकता है। आइए जानते है कुछ ऐसे ही तथ्यों के बारे में:
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पैगम्बर शाकाहारी थे: आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि इस्लाम धर्म के पैगम्बर शाकाहारी थे, कहा जाता है कि जब पैगम्बर साहब मक्का-मदीना यात्रा पर गए थे, तो उन्होने वहां भी किसी जानवर की बलि नहीं दी थी। उनका मानना था कि किसी जीव के मृत शरीर से इंसान अपना खाली पेट कभी नहीं भर सकता है।

इस्लाम का आधिकारिक रंग हरा है: इस्लाम का आधिकारिक रंग हरा है जो शाकाहार का प्रतीक है, जो जानवरों को स्वतंत्र और फल व सब्जी खाने के लिए प्रेरित करता है। कुरान में भी वर्णन किया गया है कि जानवर, मानव की तरह ही होते हैं जिन्हे शोषित करना उचित नहीं है।
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अरब ने मांसाहार का बढावा दिया: अरब ने ही मांसाहार को बढावा दिया है, क्योंकि वहां के लोगों के पास भोजन के साधन सीमित थे और ऐसा भी कहा जाता है कि कई लोगों ने इसी वजह से इस्लाम को स्वीकार भी कर लिया था। वरना इस्लाम धर्म शाकाहार को ही समर्थन देता था।

पहले पशुओं की हत्या उचित नहीं मानी जाती थी: इस्लाम में पहले स्वाद के लिए पशुओं की हत्या उचित नहीं मानी जाती थी, उन्हे किसी भी खुशी के अवसर पर हलाल नहीं किया जाता था, लेकिन एक बार ऐसा होने के बाद यह उनके जलसे का हिस्सा बन गया और वह इसे मीट के नाम पर खाने लगे। हालांकि उनका धर्म भी पशु हत्या के पक्ष में नहीं है।



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